“भ्रष्टाचार का जंगल: क्या आईएफएस ही जिम्मेदार?”

राज्य में आखिर क्या चल रहा है? क्यों एक के बाद एक Indian Forest Service (आईएफएस) अधिकारियों के नाम भ्रष्टाचार के मामलों में सामने आ रहे हैं? कौन हैं वे अफसर जिन पर ईओडब्ल्यू और एसीबी ने शिकंजा कसा है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह सिर्फ शुरुआत है या सिस्टम की गहराई तक फैली बीमारी?
रायपुर से उठती इस खबर ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर क्यों शराब, डीएमएफ और कोयला घोटालों में आईएफएस अफसरों के नाम जुड़ रहे हैं? क्या इन मामलों में पहले से शिकायतें थीं? अगर थीं, तो कार्रवाई में इतनी देर क्यों हुई?
सूत्र बताते हैं कि लगभग 50 से अधिक आईएफएस और अन्य अधिकारियों पर जांच की आंच है। लेकिन सवाल यह है—क्या सभी पर समान रूप से कार्रवाई होगी या कुछ नाम ही निशाने पर रहेंगे? क्या पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुई गड़बड़ियों की परतें अब खुल रही हैं? और अगर हां, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
“महादेव सट्टा ऐप” से जुड़े फंडिंग और लेन-देन में भी कुछ अधिकारियों के नाम आने की चर्चा है। आखिर यह नेटवर्क कितना बड़ा है? क्या इसमें सिर्फ अधिकारी ही शामिल हैं या कोई बड़ा गठजोड़ काम कर रहा है?
सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच की अनुमति दी है। लेकिन बड़ा सवाल—क्या यह जांच निष्पक्ष होगी? क्या जनता को पूरी सच्चाई पता चल पाएगी? और क्या दोषियों को सजा मिलेगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
अमन प्रकाश पूछता है—
कब तक चलता रहेगा यह भ्रष्टाचार का खेल?
कौन देगा जनता के पैसों का हिसाब?
क्या सिस्टम खुद को साफ करने के लिए तैयार है?
अब नजरें जांच एजेंसियों पर हैं। जवाब भी वहीं से आएगा—या फिर सवाल और गहरे होते जाएंगे?



