इलेक्ट्रोल बांड का चंदा,काला सफ़ेद का धंधा?

एम. डी. आरिफ की रिपोर्ट……………
इलेक्ट्रोल बांड को लेकर मंगलवार से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है।याचिका करता का कहना है की इलेक्ट्रोल बांड की गोपनीयता से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। राजनीति में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। चुनाव लड़ने के लिए सभी राजनीतिक दलों को बराबरी का मौका नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की संविधान पीठ के समक्ष एसोसियशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से याचिका दायर की गई है।याचिका करता के वकील प्रशांत भूषण का कहना था,इलेक्टोरल बांड के नियम, संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत सूचना अधिकार कानून को खत्म करते हैं। इलेक्ट्रोल बॉन्ड सत्ताधारी पार्टी को रिश्वत के रूप में देकर सरकार से मन माफिक कार्य कराया जा सकता है। बांड के जरिये रिश्वत को भी कानूनी जामा पहना दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में यह भी जानकारी दी गई है ,कि इलेक्ट्रोल बांड का चंदा केंद्र में काबिज सत्ताधारी दल को 5271 करोड रुपए का चुनावी चंदे से मिला है। कांग्रेस को पिछले 5 वर्षों में 952 करोड रुपए का चुनावी चंदा बांड से मिला है। टीएमसी को 767 करोड ,एनसीपी को 63 करोड़,टीआरएस को 383 करोड़ टीडीपी को 112 करोड़,वाईएसआर को 330 करोड़, बीजू जनता दल को 622 करोड़, शिवसेना को 111 करोड़, आम आदमी पार्टी को 48 करोड़ और जदयू को 24 करोड रुपए चंदा मिला है। सुप्रीम कोर्ट में यह भी बताया गया है कि चुनावी बांड के रूप में सीपीआईएम ने चंदा लेने से इनकार किया है।इलेक्रट्रोल बॉन्ड के रूप में जो चंदा राजनीतिक दलों को दिया गया है।उसमें 95 फ़ीसदी चंदा एक करोड रुपए से ऊपर के बांड चंदे चंदे के रूप में राजनीतिक दलों को मिला है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल का यह भी कहना था,कि यदि चंदे के मिले पैसे से राजनीतिक दल टीवी चैनल को विज्ञापन देकर अपनी विचारधारा का प्रचार करना चाहते हैं।तो वह भी आसानी के साथ करा सकते हैं।
केंद्र सरकार द्वारा कंपनी अधिनियम एवं चंदा लेने के नियमों में जो परिवर्तन किया गया है। उसके अनुसार विदेशी कंपनी, जिसकी सहयोगी कंपनी का यदि भारत में ऑफिस है तो वह भी विदेशी चंदा दे सकता है। याचिका करता को सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर थी, कि इलेक्ट्रोल बांड से किसको कितना चंदा दिया है।यह जानने का अधिकार जनता को नही है। यह बात जनता से छुपाई क्यों जा रही है। इलेक्ट्रोल बॉन्ड से जो भी चंदा राजनीतिक दलों को मिला है। उनकी केंद्र में सरकार है, या राज्यों में उनकी सरकारें है। उन्ही राजनीतिक दलों को इलेक्ट्रोल बांड से चंदा मिला है। अन्य राजनीतिक दलों को जिनकी सरकारें नहीं थी।उन्हें चंदा नहीं मिला,जो राजनीतिक तौर पर असमानता को बढ़ाता है। चुनाव की निष्पक्षिता को भी प्रभावित करता है। याचिकाकर्ता के वकीलों का यह भी कहना था, कि इलेक्ट्रोल बांड स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कोई भी व्यक्ति खरीद सकता है। उसकी पहचान भी पूरी तरह से गोपनीय रखी जाती हैं। बांड खरीदने वाले की पहचान ना तो बैंक उजागर करेगा और ना ही राजनीतिक दल, जिसे उसने चंदा दिया है। वह भी जानकारी नहीं देगा। जिसके कारण खुले रूप से काला धन या विदेशी चंदा इलेक्टोरल बांड के माध्यम से राजनीतिक दलों तक पहुंच रहा है। इसकी कोई जांच नहीं किए जाने से बड़े पैमाने पर काले धन को राजनीतिक दलों को देकर सफेद करने का धंधा चल रहा है।आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार पर आबकारी घोटाले में रिश्वत लेकर गोवा चुनाव में पैसे खर्च करने की बात कही जा रही है। यदि यह पैसा बांड के माध्यम से लिया गया होता, तो रिश्वत का पैसा होते हुए भी वह कानूनी रूप से मान्य हो जाता। यदि दिल्ली सरकार का रिश्वत लेना और उसका प्रयोग चुनाव में करना अपराध है। तो इलेक्ट्रॉल बांड के माध्यम से बांड से जो चंदा दिया जा रहा है। तो वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।बहरहाल सुप्रीम कोर्ट में अब इलेक्ट्रोल बांड को लेकर सुनवाई शुरू हो गई है।दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका में आबकारी घोटाले में ली गई रिश्वत की रकम को गोवा चुनाव में खर्च किए जाने की बात सुप्रीम कोर्ट में एक बार जांच एजेंसी ईडी द्वारा सामने आई है।क्या राजनीतिक दल को भी इसमें पार्टी बनाया जा सकता है यह सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था। जिस तरीके से याचिकाकर्ता के वकीलों ने अपना पक्ष रखा है। उससे यह स्पष्ट हो रहा है, कि इलेक्ट्रोल बैंड का गोरख धंधा अब भाजपा के लिए भी एक मकडजाल की तरह जाल बुनता हुआ नजर आ रहा है।जिसमें भाजपा खुद भी फंसती हुई नजर आ रही है। बहरहाल अभी इस मामले की सुनवाई चल रही है।केंद्र सरकार का कहना था, कि इलेक्ट्रोल बांड से मिले हुए चंदे के बारे में जनता को जानने का कोई हक नहीं है। इस बात का फैसला भी अब सुप्रीम कोर्ट को करना है। इस याचिका को लेकर देश में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई है।



