राष्ट्रीय

मतदाता को विभाजनकारी भाषणसे भी चुनाव में ठगा जाता है?

एम. डी. आरिफ की रिपोर्ट…

भारत में चुनाव अब विकासवादी नीतियों या विचारधारा के ऊपर नहीं हो रहे हैं, बल्कि लोकलुभावन घोषणाओं और भाषण की जादूगरी पर हो रहे हैं। सारे विचार अब सिमट कर लोकलुभावन घोषणाओं या लच्छेदार लेकिन निरर्थक भाषणों में समाहित हो गए हैं। बड़े से बड़े नेता का करिश्मा भी इतना ही भर रह गया है कि वह कितनी बड़ी लोकलुभावन घोषणा कर सकता है। अगर लोकलुभावन घोषणाओं की केंद्रीयता से अलग कोई एक और चीज चुनाव को परिभाषित करने वाली है तो वह विभाजनकारी भाषण हैं।

धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर विभाजन भी भारत में होने वाले चुनावों का एक महत्वपूर्ण तत्व बन गए हैं। लेकिन स्वतंत्र रूप से उनकी भी कोई हैसियत नहीं है अगर उनके साथ कुछ लच्छेदार बातें और लोकलुभावन घोषणाएं नहीं हैं। हाल में हुए अनेक चुनावों में यह प्रमाणित हुआ कि पार्टियों को चुनाव लड़ते समय किसी किस्म की वैचारिक जटिलता में पड़ने की जरुरत नहीं है। उन्हें मुफ्त में सेवाएं और वस्तुएं बांटने की घोषणा करनी है और कहीं कहीं भड़काऊ व विभाजनकारी बातें करनी हैं। इतने भर से काम चल जाएगा।

सवाल है कि यह अगर इतना ही सरल है और सभी पार्टियां इसी फॉर्मूले पर चुनाव लड़ रही हैं तो भाजपा को ही ज्यादा सफलता क्यों मिल रही है और दूसरी पार्टियां क्यों नहीं ज्यादा फायदा उठा पा रही हैं? यह सही है कि ज्यादा सफलता भाजपा को मिल रही है लेकिन यह बात लोकसभा चुनाव के संदर्भ में जितनी सही है राज्यों के चुनावों के मामले में उतनी नहीं हैं। राज्यों में दूसरे नेता भी लोकलुभावन घोषणाओं और अपनी क्षेत्रीय या भाषायी अस्मिता पर आधारित विभाजनकारी मुद्दा उठा कर चुनाव जीत जाते हैं।

तमिलनाडु से लेकर पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश से लेकर दिल्ली, पंजाब तक में इसे देखा जा सकता है। असल में लोकलुभावन घोषणाएं और विभाजनकारी नीतियां एकसमान रूप से अपनाने के बावजूद उस नेता के जीतने के बेहतर अवसर होते हैं, जिसकी भाषण शैली बेहतर होती है और जो जनता के साथ बेहतर संवाद करने वाला होता है। नरेंद्र मोदी हों या अरविंद केजरीवाल इनको संवाद की अपनी क्षमता और भाषा का लाभ मिलता है।

राजनीति में भाषा के संबंध और महत्व को महान लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने लेखन में विस्तार से समझाया है। उन्होंने दो लंबे निबंध लिखे थे, ‘पॉलिटिक्स एंड द इंगलिश लैंग्वेज’ और ‘व्हाई आई राइट’। इसके अलावा जिन लोगों ने उनकी महान रचना ‘नाइंटीन एटी फोर’ पढ़ी है उनको इसका और बेहतर अंदाजा होगा। इस उपन्यास के अंत में एक एपेंडिक्स है, ‘द प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’, जिसमें उपन्यास के काल्पनिक एकाधिकारीवादी देश ‘ओसेनिया’ की भाषा के बारे में बताया गया है। ‘ओसेनिया’ में शासन की भाषा का अपना शब्दकोष है। उसके ‘बी शब्दकोष’ में ‘कोई भी शब्द ऐसा नहीं है, जो वैचारिक रूप से निरपेक्ष हो’।

इसका मतलब है कि सारे शब्द मूल अर्थ से अलग अर्थ ध्वनित करने वाले हैं। जैसे जहां मजदूरों से बेगारी कराई जाए या जबरदस्ती काम कराया जाए उसको ‘जॉयकैम्प’ कहा जाता है और युद्ध के मंत्रालय को ‘मिनीपैक्स’ यानी मिनिस्ट्री ऑफ पीस (शांति का मंत्रालय कहा जाता है) यानी सारे शब्द देखने और सुनने में जैसे लगते हैं उनका अर्थ उसके बिल्कुल उलट होता है।

भारत में लोकलुभावन या विभाजनकारी भाषणों से जिन नेताओं का चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बेहतर है उनके भाषणों या शासन की भाषा में ‘प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’ की झलक बहुत साफ दिखाई देगी। मिसाल के तौर पर भारत सरकार किसानों को पांच सौ रुपया महीना देती है तो उसको ‘सम्मान निधि’ कहा जाता है। दिल्ली सरकार ने वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में महिलाओं को एक हजार रुपए महीने देने का फैसला किया तो इसका नाम ‘महिला सम्मान योजना’ रखा। झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार महिलाओं को 11 सौ रुपया महीना दे रही है तो उसे ‘मइया सम्मान योजना’ कह रही है। सोचें, किसानों को 17 रुपया रोज और महिलाओं को 33 रुपया रोज देने की योजना उनके सम्मान की योजना कैसे हो सकती है? लेकिन यही ‘प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’ है कि आप भीख या दान दें और उसको सम्मान बताएं! भारत के समकालीन श्रेष्ठ कवियों में से एक राजेश जोशी ने एक कविता में लिखा है, ‘कहावतें अर्थ से ज्यादा अभिप्राय में निवास करती हैं’।

सो, नेताओं की बातों के अर्थ नहीं, उनके अभिप्राय देखने की जरुरत होती है परंतु दुर्भाग्य से आम मतदाता इसे देख नहीं पाता है। उसे लगता है कि नेता उसके भले की बात कर रहे हैं, उसका जीवन आसान करने के लिए कुछ चीजें और कुछ सेवाएं मुफ्त में दे रहे हैं और उसके सम्मान, उसकी अस्मिता आदि की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन असल मे ऐसा नहीं होता है। असल में अस्मिता के आधार पर विभाजन और तमाम लोकलुभावन घोषणाएं, आम मतदाता को ठगने की योजना ही होती हैं। यह नेता के ऊपर निर्भर होता है कि वह कैसे भाषा की जादूगरी से इसे लोगों तक पहुंचाता है और उनको अपने पक्ष में ले आता है। कुछ नेता इसमें दूसरों के मुकाबले ज्यादा माहिर होते हैं इसलिए उनको ज्यादा सफलता मिलती है।

अगर अभी चल रहे चुनावों की ही बात करें तो सभी पार्टियां समान रूप से लोकलुभावन घोषणाएं कर रही हैं और सब एक समान रूप से बांटने या जोड़ने की बात कर रहे हैं। अगर आप ‘प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’ के बारे में जानते हैं तो आपको तुरंत समझ में आ जाएगा कि जो जोड़ने की बात कर रहा है वह भी असल में तोड़ने की ही बात कर रहा है। वह इसके लिए अलग शब्दावली का इस्तेमाल कर रहा है। ‘बटेंगे तो कटेंगे’ और ‘जुड़ेंगे तो जीतेंगे’ कहने वालों की मूल भावना में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों नारों को अर्थ से ज्यादा अभिप्राय में देखने की जरुरत है।

बहरहाल, महाराष्ट्र और झारखंड दोनों जगह घोषणाओं और गारंटियों पर चुनाव लड़ा जा रहा है। महिलाओं और युवाओं को नकदी बांटने की घोषणाएं की जा रही हैं। महिलाओं को सस्ता या मुफ्त गैस सिलिंडर देने के वादे हो रहे हैं। छोटे उद्यमियों को सस्ता या बिना ब्याज का कर्ज देने के वादे हो रहे हैं। रोजगार और नौकरियों की बहार लाने का ऐलान हो रहा है। फ्री बिजली और पानी की योजना को ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी ने इस मामले में बढ़त बनाई हुई है। परंतु भाषा की जादूगरी देखिए कि प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के हर उस काम का बचाव कर ले रहे हैं, जिसके लिए वे विरोधी पार्टियों की आलोचना करते हैं।

झारखंड में ‘इंडिया’ ब्लॉक ने अलग अलग राजनीतिक परिवारों के 20 लोगों को टिकट दिया है तो भाजपा ने भी 18 लोगों को टिकट दिया है। लेकिन प्रधानमंत्री ने जबरदस्त जोश में कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के परिवारवाद पर हमला किया। भाजपा का मानना है कि विपक्षी पार्टियां परिवार के लोगों को टिकट देती हैं तो वह परिवारवाद है और भाजपा टिकट देती है तो वह परिवार सम्मान योजना है। इसी तरह विपक्षी पार्टियां वस्तुएं व सेवाएं मुफ्त में देती हैं तो वह मुफ्त की रेवड़ी है या झूठा वादा है और जब भाजपा देती है तो वह किसान या महिला या युवा सम्मान की योजना है।

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