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एआई समिट के बाद निजी विश्वविद्यालयों पर उठे सवाल पेटेंट अर्जियों के आंकड़ों से बनाई जा रही ‘उपलब्धि’ की छवि?

नई दिल्ली/रायपुर। एआई समिट के दौरान गलगोटिया विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद अब देशभर की निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। अब चर्चा सिर्फ एक संस्थान तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के कामकाज और शोध दावों की सच्चाई पर बहस तेज हो गई है।

जानकारी के मुताबिक, कई निजी विश्वविद्यालय वास्तविक अनुसंधान और आविष्कार के बजाय पेटेंट अर्जियों की संख्या को उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, 2020 से 2025 के बीच लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ने 7,096 पेटेंट अर्जियां दाखिल कीं, लेकिन इनमें से केवल 164 को ही पेटेंट मिला — यानी सफलता दर लगभग 2.3 प्रतिशत रही।

विशेषज्ञों का कहना है कि पेटेंट अर्जियां दाखिल करना आसान हो गया है, खासकर 2021 में पेटेंट कानून में हुए संशोधन के बाद। लेकिन असली पैमाना पेटेंट स्वीकृति और शोध की गुणवत्ता होना चाहिए, न कि सिर्फ आवेदन की संख्या।
वहीं, आईआईटी, एनआईटी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जैसे सरकारी संस्थानों की पेटेंट अर्जियां भले कम हों, लेकिन उनकी सफलता दर 40 प्रतिशत से अधिक बताई जा रही है। इसे मजबूत जांच और गुणवत्ता नियंत्रण का परिणाम माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि निजी विश्वविद्यालयों की यह रणनीति दोहरे लाभ के लिए अपनाई जाती है — एक ओर छात्रों को आकर्षित करना और दूसरी ओर सरकारी अनुदान प्राप्त करना।
अब बड़ा सवाल यह है कि एआई समिट के दौरान हुई आलोचना से क्या सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन कोई ठोस सबक लेंगे?
📌 इस मुद्दे पर देशभर में बहस तेज, शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता की मांग

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