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दस साल की लंबी अवधि में यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि नीति आयोग का काम क्या है?

एम. डी. आरिफ की रिपोर्ट…

दस साल में यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि नीति आयोग की भूमिका क्या हैअधिक से अधिक वह एक ऐसे थिंक टैंक के रूप में मौजूद हैजिसने सरकार की आलोचनाओं का जवाब देने के लिए आंकड़े जुटाए (अथवा गढ़े) हैं।

ममता बनर्जी ने नीति आयोग की बैठक में जाने का फैसला किया। मगर वे बीच में ही बैठक से वॉकआउट कर गईं। इसके विपरीत इंडिया गठबंधन के अन्य मुख्यमंत्रियों ने बैठक का बहिष्कार किया। उन मुख्यमंत्रियों ने इस शिकायत आधार पर यह कदम उठाया कि पिछले हफ्ते पेश केंद्रीय बजट में विपक्ष शासित राज्यों के साथ भेदभाव किया गया है। इस आरोप से तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष भी सहमत हैं, लेकिन उन्होंने बेहतर यह समझा कि आयोग की बैठक में जाकर इसे कहा जाए। बहरहाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने एक कहीं बड़ा सवाल उठा दिया है। बैठक से एक दिन पहले उन्होंने दो टूक कहा कि नीति आयोग एक बेमतलब संस्था है, जिसे भंग कर दिया जाना चाहिए। बनर्जी ने फिर से योजना आयोग के गठन की मांग भी की है। योजना आयोग का दोबारा गठन हो या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। नियोजित एवं राज्य-निर्देशित अर्थव्यवस्था के दौर में योजना आयोग की प्रमुख भूमिका थी। नव-उदारवादी दौर में उसकी भूमिका महज संसाधनों के वितरण पर सहमति बनाने की रह गई थी। 

2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तो नव-उदारवाद पर निर्बाध अमल के प्रति अपनी निष्ठा जताने के लिए उन्होंने जो सर्व-प्रथम कदम उठाए, उनमें योजना आयोग को भंग करना भी एक था। इसकी जगह उनकी सरकार ने नीति आयोग का गठन किया। मगर दस साल की लंबी अवधि में यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि नीति आयोग का काम क्या है और देश के प्रशासन में उसकी भूमिका क्या है? अधिक से अधिक वह एक ऐसे थिंक टैंक के रूप में मौजूद रहा है, जिसने सरकार की आलोचनाओं का जवाब देने के लिए आंकड़े जुटाए (अथवा गढ़े) हैं। साल में एक बार प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक भी वह आयोजित करता रहा है। लेकिन उसमें कभी कोई प्रभावी चर्चा हुई हो, इसके संकेत नहीं हैं। ऐसे में दस साल बाद अब उसकी भूमिका और उपयोगिता पर चर्चा करने का उचित समय है। इस सिलसिले में ममता बनर्जी ने जो कहा है, उसे बहुत से अन्य लोग भी महसूस करते हैं। बेहतर होगा कि नीति आयोग इस पर चर्चा के लिए भी अपनी एक बैठक बुलाए।

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