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अदालतों में लंबित मामले बड़ी चुनौती, जजों की यह जिम्मेदारी है वे न्याय की रक्षा करें- मुर्मू

 

एम. डी. आरिफ की रिपोर्ट…

नई दिल्ली। जिला अदालतों के नेशनल कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन भी अदालतों में लंबित मुकदमों और न्याय मिलने में होने वाली देरी पर चर्चा हुई। रविवार को इस कॉन्फ्रेंस के समापन समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लंबित मुकदमों का जिक्र किया और कहा कि लंबित मामले न्यायपालिका के लिए बड़ी चुनौती हैं। उन्होंने कहा- जब रेप जैसे मामलों में कोर्ट का फैसला एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद आता है, तो आम आदमी को लगता है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई संवेदनशीलता नहीं बची है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने रविवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में जिला अदालतों के नेशनल कॉन्फ्रेंस के समापन समारोह में शामिल हुईं। इससे पहले शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया था। रविवार को समापन समारोह में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और कानून व न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी शामिल हुए। इस कार्यक्रम में द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के 75 साल पूरे होने के मौके पर इसका झंडा और प्रतीक चिन्ह भी जारी किया। इससे पहले शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी ने डाक टिकट और सिक्का जारी किया था।

बहरहाल, रविवार को राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा- न्यायालयों में तत्काल न्याय मिल सके इसके लिए हमें मामलों की सुनवाई को आगे बढ़ाने के कल्चर को खत्म करना होगा। इसके लिए सभी जरूरी प्रयास किए जाने चाहिए। इस देश के सारे जजों की यह जिम्मेदारी है वे न्याय की रक्षा करें। राष्ट्रपति ने कहा- कोर्ट रूम में आते ही आम आदमी का तनाव बढ़ जाता है। उन्होंने इसे ‘ब्लैक कोट सिंड्रोम’ का नाम दिया और सुझाव दिया कि इसका अध्ययन किया जाए। उन्होंने न्यायपालिका में महिला अफसरों की बढ़ती संख्या पर खुशी भी जताई।

राष्ट्रपति ने कहा- गांव के लोग न्यायपालिका को दैवीय मानते हैं, क्योंकि उन्हें वहां न्याय मिलता है। एक कहावत है- भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। लेकिन आखिर कितनी देर? हमें इस बारे में सोचना होगा। जब तक किसी को न्याय मिल पाता है, तब तक उनके चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी होती है, कई मामलों में उनकी जिंदगी तक खत्म हो जाती है। इस बारे में गहराई से विचार करने की जरूरत है।

 

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