पंचायती राज अधिनियम 1993 पंचायतो एवं निकायों को अधिकार संपन्न और कर्णधार सरपंच ग्राम पंचायत बनाता है – गोपाल धीवर

भारतीय लोकतंत्र दुनिया की सबसे व्यापक उदारवादी लोकतांत्रिक तथा सुक्ष्मान्तर न्याय प्रणाली से विकसित की गयी है।जिसे एक आदर्श संविधान के द्वारा संचालित किये जाने के लिए बनायी गयी संसार का एक मात्र चहुंमुखी व्यवस्था संपन्न सामाजिक न्याय शास्त्र है।जिसे इस दुर्लभ दुनिया का महानतम विद्वान कर्मयोगी् बाबा साहेब डा.भीमराव अम्बेडकर द्वारा सृजित किया गया है,जो सर्वविदित है।जिसमें भारत की गांवों की सकरी गलियों की झोपड़ियों में रहने वाले गरीब मजदूरो से लेकर शहरों की शानदार चौड़ी सड़कों की खूबसूरत इमारतों में निवास करने वाले साधन संपन्न पूंजीपति अमीरो की हितों की संरक्षण,संवर्धन,न्याय विकास आदि के लिए सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था युक्त न्याय प्रदान करने हेतु सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासतो,अधिकारों,कर्तव्यो,और उत्तरदायित्वों से युक्तियुक्त लाजवाब पैमाना तय किया गया है।
यदि इसमे हम न्याय प्रणाली की बात करें तो,एक तरफ district, High,& supreme court है और दूसरी ओर nayab Tahsildar,Taahsildar, sdm,Adm,dm, additional commissioner, तथा commissioner आदि की लाखों रुपए की salary और gratuity एवं अन्य आवश्यक facilities की व्यय से होने वाली शासकीय राजस्व की हानि को समस्त आवाम सहर्ष स्वीकार करती है।
पर इन सबमें सबसे उत्कृष्ट और प्राथमिक न्यायालय की नाम से जानें जानेवाली लाजवाब न्यायालय ग्राम न्यायालय होती है,जिसका न्यायाधीश सरपंच होता है।
जो तमाम विषमताओं का सामना करते हुए,समुचा देश में अब तक की सबसे अधिक मामलों का निराकरण करने में सफलता अर्जित की है।
यद्यपि सरपंच ग्राम पंचायत अपनी जिंदगी की बहुत महत्वपूर्ण और बेशकीमती समय मानव समाज को दे देता है।
फिर भी सेवा के बदले एक फीसदी मूल्य भी उसे हासिल नही हो पाता यही इस लोकतंत्र की सबसे दुर्भाग्यशाली और संवेदनशील विषय है,जिस पर गहन चिन्तन की आवश्यकता है।
क्योंकि इस एक सौ चालीस करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाली उपमहाद्वीप की उपमा से नवाजी गयी इस विविधता सम्पन्न भारत वर्ष में,पंचायती राज अधिनियम 1993 को लेकर बात करे तो इन तीस वर्षों में,ऊपरी न्यायालयो की न्यायाधीशो की दस करोड़ लंबित मामलों और उसके बहुत न्यूनतम निराकरण के विरुद्ध बतौर ए प्राथमिक न्यायाधीश ग्राम न्यायालय सरपंच ग्राम पंचायत द्वारा दस गुणा अधिक यानी करोड़ों बहुत जटिल समस्याओं का समाधान निकाला गया है।जिसके लिए उस महान समाज सेवक द्वारा शासन प्रशासन और जनसाधारण से कोई भी सुविधाएं अथवा श्रम मूल्य पारिश्रमिक आदि नहीं लिया जाता है।इन सबमें सबसे अधिक दुर्भाग्यजनक बात इस बात की है कि,विकसित देशों की यात्रा की मुहाने पर खड़ी सभ्य संस्कृति वाली विद्वानों का इस वर्तमान भारत में,यद्यपि आज पंचायती राज अधिनियम 1993 की धारा 56 जिसमें समस्त प्रकार की भू प्रबंधन,जैसे अतिक्रमण रोकने और हटाने तथा निर्माण आदि के लिए प्रदत्त शक्तिया लोकतांत्रिक अधिकारों की बेहद शानदार विकेंद्रीकरण है।जिसके तहत स्थानीय लोक संस्थानो पंचायतो एवं निकायों को अधिकार संपन्न बनाया गया है।निश्चित ही नयी पंचायत संविधान उत्कृष्ट जीवन पद्धति की ओर गतिशील है,और जिसका कर्णधार सरपंच ग्राम पंचायत है,जिसके द्वारा निशुल्क शानदार ग्रामीण व्यवस्था निष्पादन का इतिहास लिखा गया है।उस पर भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 248(1) को अनावश्यक थोप दिया गया है।और तहसीलदार और अन्य उच्च व्यूरओक्रएट को उसका मालिक बना दिया गया है।
यही कुशासन और अव्यवस्था इस देश को कमजोर बना दिया है। जिसके लिए वह हरेक शासन प्रशासन की नुमाइंदे जिम्मेदार है,जिसने संविधान की मर्यादाओं को अक्षुण्ण बनाए रखने की सपथ ली हुई है।यद्यपि यकीनन सरपंच ग्राम पंचायत इन अव्यवस्थित प्रथाओ के विरुद्ध संघर्षशील है।
फिर भी यही हमारे देश की राजनीति की सबसे बड़ी UNFORTUNATE विषय है।जिसे मानव सभ्यता की विशिष्टता की अनुरूप व्यवस्था की पटरी में लाने की हम सबकी जिम्मेदारी है।



