छत्तीसगढ़

8. छत्तीसगढ़ में गहराता भूजल संकट

रायपुर ।   छत्तीसगढ़ में पिछले दो वर्षों के भीतर राज्य के 55 प्रतिशत से अधिक भूजल मूल्यांकन क्षेत्र ‘ओवरएक्सप्लॉइटेड’ (अत्यधिक दोहन) की श्रेणी में आ गए हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले दो मानसून सत्रों में अच्छी बारिश के बावजूद जमीन के नीचे पानी का स्तर नहीं सुधरा है.

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट (2024-25) के अनुसार, राज्य के कुल 205 मूल्यांकन क्षेत्रों में से 117 में पानी की निकासी रिचार्ज की तुलना में कहीं अधिक है, जबकि केवल 55 क्षेत्र ही अब ‘सुरक्षित’ श्रेणी में बचे हैं.

बस्तर संभाग को छोड़ दिया जाए तो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और सरगुजा संभाग के अधिकांश जिलों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है.

आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में 650 मिमी और 2023 में 630 मिमी से अधिक बारिश हुई, लेकिन यह पानी जमीन के भीतर नहीं पहुंच सका.

 

रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, मुंगेली और बालोद जैसे जिलों के लगभग सभी ब्लॉक अब डेंजर जोन में हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भारी बारिश संकट का समाधान नहीं है, क्योंकि रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के प्रति उदासीनता और कृषि कार्यों में भूजल के 84 प्रतिशत तक अत्यधिक उपयोग ने स्थिति को गंभीर बना दिया है.

 

जल विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कॉलेजों, अस्पतालों और सरकारी कार्यालयों में वैज्ञानिक तरीके से रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अपनाई जाए, तो भूजल स्तर में 20 प्रतिशत तक सुधार हो सकता है.

वर्तमान में हालात यह हैं कि गांवों और शहरों में पारंपरिक कुएं और ट्यूबवेल सूख रहे हैं, जिससे आबादी का एक बड़ा हिस्सा टैंकरों पर निर्भर हो गया है. जानकारों ने चेतावनी दी है कि यदि जल प्रबंधन की टिकाऊ पद्धतियां नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले समय में राज्य को साल के छह से सात महीने भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है.

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