छत्तीसगढ़

7. छत्तीसगढ़ में अपनी जगह बना ली थाईलैंड के ड्रैगन ने, सिर्फ रात में होती है पौधे की ग्रोथ

रायपुर।   थाइलैंड, वियतनाम, इजऱायल और श्रीलंका में बहुत ही लोकप्रिय होने वाला फूट छत्तीसगढ़ में 16 साल पहले आया, और आज प्रदेश के अधिकतर भागों में किसानों को लाभ की फसल दे रहा है. हम बात कर रहे हैं ड्रैगन फ्रूट की. नाम की तरह बनावट लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है.

प्रदेश के ड्रैगन फ्रूट की डिमांड अरब देशों तक है. इसकी पूर्ति दुर्ग जिले के धमधा कुम्हारी और पाटन के साथ कबीरधाम, राजनांदगांव, बेमेतरा, महासमुंद सहित छोटे स्तर पर अन्य जिलों से हो रही है. हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट की माने तो 2006 से पहले तक ड्रैगन फ्रूट की खेती छत्तीसगढ़ में नहीं होती थी. प्रदेश में यह फल थाइलैंड व गुजरात से ही आता था. अब साल में तकरीबन 300 करोड़ रुपए का ड्रैगन फ्रूट देश व विदेशों में छत्तीसगढ़ से जा रहा है.

विभाग देता है तकनीकी मदद

उद्यानिकी विभाग उन्नत खेती को बढ़ावा देने लगातार प्रयास कर रहा है. बंजर जमीन पर लहलाने वाली ये फसल समृ़द्ध किसानों की पहली पसंद है. विभाग के सहायक संचालक आरएन पाण्डेय ने बताया इसकी खेती में शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन एक बार खेत तैयार हो जाने के बाद इससे लगातार लाभ लिया जा सकता है.

ड्रैगन फ्रूट में भरपूर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट, प्रोटीन फाइबर, विटामिंस और कैल्शियम पाया जाता है. यही कारण है कि इसे वजन घटाने में मददगार कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक और कैंसर के लिए लाभकारी बताया जाता है. साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की विशेष गुण होने के कारण कोरोना काल में इसका महत्व में काफी बढ़ गया था.

बात करीबधाम जिले की करंे तो यहां सिलाटी और बाना के किसान इसकी अ’छी खेती ले रहे हैं. जिले में करीब 20 एकड़ में खेती हो रही है. जो डिमांड पर लोकल बाजार में भी खप जाती है. विभाग के बीएस परिहार ने बताया वर्ष 2019-20 में योजना के तहत अनुदान पर किसानों को पौधों का वितरण किया गया था. विभाग लगातार तकनीकी मार्गदर्शन व ट्रेनिंग देता रहा है.

सालभर में देने लगता है फल

सिंचाई के बाद अब बात आती है ड्रैगन फ्रूट की तुड़ाई की तो ड्रैगन फ्रूट पहले ही साल में फल देना शुरू कर देते है. आपको बता दे कि ड्रैगन फ्रूट के पौधों में मई से जून के महीने में फूल लगते हैं, और फल अगस्त से दिसंबर महीने में आते हैं.

ड्रैगन फ्रूट लाल, गुलाबी और पीले रंग का होता है. इसका इस्तेमाल वाइन बनाने में भी किया जाता है. ये मैक्सिको, साउथ अमेरिका, कंबोडिया, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और चीन के अलावा भी कुछ देशों में पाया जाता है.

सिर्फ रात में बढ़ता है पौधा

कैक्टस की किस्म वाले पौधों से निकलने वाला फूल तीन हफ्तों में ड्रैगन फ्रूट में बदल जाता है. ये रात को ही बढ़ता है, इसलिए इसके फूल को क्वीन ऑफ द नाइट भी कहते हैं. विभाग के अधिकारियों ने बताया कैक्टस का पेड़ 40 डिग्री से ज्यादा तापमान वाले इलाकों में भी तेजी से बढ़ता है.

उद्यानिकी विभाग दे रहा मार्गदर्शन

उद्यानिकी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर भूपेंद्र पाण्डेय बताते हैं कि धीरे-धीरे प्रदेश में करीब 300 हेक्टेयर में ड्रेगन फूट की खेती हो रही है. राज्य के समृद्ध किसानों का रुझान इस खेती की तरफ ज्यादा हो रहा है. प्रदेश व अन्य राज्यों में फल की डिमांड अधिक है. विभाग पूरी तरह किसानों को मार्गदर्शन दे रहा है.

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