छत्तीसगढ़

2. तीजन बाई और ममता चंद्राकर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार:राष्ट्रपति के हाथों मिलेगा सम्मान; जानिए दोनों लोक गायिकाओं के सफर की खास बातें

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ की कुलपति ममता चंद्राकर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। ममता चंद्राकर छत्तीसगढ़ की मशहूर लोक गायिका हैं। छत्तीसगढ़ के राज्य गीत अरपा पैरी के धार को स्वर देने वाली लोक गायिका पद्मश्री ममता चंद्राकर को राष्ट्रपति के हाथों ये पुरस्कार मिलेगा। साथ ही मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई को भी संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

राष्ट्रीय संगीत नृत्य और नाटक अकादमी नई दिल्ली की सामान्य परिषद ने पुरस्कारों की घोषणा की है। संगीत नाटक अकादमी ने देशभर से मिली प्रविष्टियों में से अलग-अलग श्रेणियों में 128 श्रेष्ठ कलाकारों और संगीत साधकों को पुरस्कारों के लिए चुना है। यह पुरस्कार 2019, 2020 और 2021 के लिए दिए जाएंगे। अलग-अलग राज्यों के 10 प्रख्यात कलाकारों को सूची में रखा गया है। लोक कला में विशेष योगदान के लिए लोक गायिका ममता चंद्राकर का चयन लोक कला श्रेणी वर्ष 2019 के लिए किया गया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दिल्ली में आयोजित होने वाले एक विशेष समारोह में देश के अन्य कलाकारों के साथ राज्य की इन दोनों विभूतियों ममता चंद्राकर और तीजन बाई को सम्मानित करेंगी। संगीत नाटक अवॉर्ड के रूप में ममता चंद्राकर को 1 लाख रुपए और ताम्रपत्र प्रदान किया जाएगा।

खैरागढ़ संगीत कला विश्वविद्यालय की कुलपति ममता चंद्राकर वर्तमान में राजनांदगांव जिले में निवासरत हैं। उन्हें 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। वहीं तीजन बाई वर्तमान में भिलाई स्थित गनियारी में निवासरत हैं। तीजनबाई को पद्मविभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। फेलोशिप के लिए देशभर से 10 कलाकारों के नाम शामिल किए गए हैं। तीजन बाई को हाल ही में श्री सत्य साईं शक्ति वुमन आफ एक्सीलेंस अवॉर्ड-2022 से सम्मानित किया जा चुका है।

ममता चंद्राकर ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा है कि उनकी और उनके माता-पिता की तपस्या पूरी हुई है। उनका सपना साकार हुआ है, जिसके लिए वे बेहत खुश हैं। उन्होंने अपने बड़े भाई लाल राम कुमार सिंह को भी अपनी सफलता का श्रेय दिया है। उन्होंने कहा कि इस पुरस्कार का मिलना उनके लिए बहुत ही सौभाग्य की बात है।

ममता चंद्राकर को विरासत में मिली लोक गायिकी

ममता चंद्राकर के पिता दाऊ महासिंह चंद्राकर भी लोककला के संरक्षक थे। ममता को घर में ही लोक कला का माहौल मिला है। पिता और बड़े भाई के सहयोग से वे लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं। उनके पिता दाऊ महासिंह चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा है। ममता चंद्राकर भी बचपन से ही लोकगीतों के लिए समर्पित रही हैं। उनके गाए हुए सुआ, गौरा गौरी, बिहाव, ददरिया बहुत मशहूर हैं। चंद्राकर आकाशवाणी केन्द्र रायपुर में बतौर निदेशक भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं।

मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई के बारे में खास बातें

पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाली लोक गायिका तीजन बाई का जन्म 1956 में भिलाई के गनियारी में हुआ था। पंडवानी महाभारत की कथा होती है। तीजन बाई ने मात्र 13 साल की उम्र से कथा वाचन शुरू कर दिया था। तीजन को पंडवानी गायन में पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कार मिल चुका है। इन्हें हम ‘कापालिक शैली’ की पहली महिला पंडवानी गायिका के रूप में जानते हैं। इनका विवाह हारमोनियम वादक तुलसीराम देशमुख से हुआ है और इनके तीन बेटे-बेटियां हैं।

पंडवानी के बारे में जानें

इनकी कथा महाभारत के ऊपर छत्तीसगढ़ी भाषा में होती है, जिसमें मुख्य नायक भीम होता है और पंडवाणी की पूरी कथा महाभारत के इर्द-गिर्द ही घूमती है। इस कथा में एक गायक, एक रागी, एक वाद्य संगत, तबला वादक, हारमोनियम वादक, मंजीरा, ढोलक बजाने वाला और जो गायक या गायिका होती है, वह खुद तंबूरा बजाकर कथा का मंचन करते हैं। इसी को हम पंडवानी (Pandwani) कहते हैं।

इस कथा को छत्तीसगढ़ी बोली के माधुर्य के साथ पंडवानी गायिका तीजन बाई अभिनय व गायन के साथ यह बताती हैं कि किस तरह चीरहरण के समय द्रौपदी रोई होगी, चिल्लाई होगी, भीम गरजे होंगे या अन्य घटनाओं में क्या हुआ होगा। इसकी कथा भीम, अर्जुन, कृष्ण, द्रौपदी, नकुल, सहदेव, भीष्म पितामह, दुर्योधन, दुःशासन, गुरु द्रोणाचार्य के इर्द-गिर्द घूमती रहती है।

इन्होंने सबसे पहली विदेश यात्रा 1985-86 में पेरिस में भारत महोत्सव के दौरान की थी। आगे चलकर भारत के बड़े शहरों के साथ फ्रांस, मॉरीशस, बांग्लादेश, स्विटजरलैण्ड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा, साइप्रस, मेसिया, टर्की जैसे देशों में भी इन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

तीजन बाई को मिल चुके हैं ये अवॉर्ड्स

श्रेष्ठ कला आचार्य (1994), संगीत नाट्‌य अकादमी सम्मान (1996), देवी अहिल्या सम्मान (1998), पद्म श्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), डी. लिट बिलासपुर विश्वविद्यालय (2003), पद्म भूषण (2003), एम एस सुब्बालक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार (2016), पद्म विभूषण (2019)

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