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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला- मध्यस्थ कोर्ट अनुबन्ध से हटकर नहीं कर सकता मध्यस्थता

आर्बिट्रेशन कोर्ट (मध्यस्थ कोर्ट) द्वारा किये गए मध्यस्थता को हाई कोर्ट ने किया रद,वर्ष 2011 में बिलासपुर निगम सीमा में अंडर ग्राउंड सीवरेज सिस्टम तैयार करने के लिए निगम ने 33 करोड़ की योजना बनाई थी। कंसलटेंट कंपनी की नियुक्ति के लिए निविदा जारी की गई थी।

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मध्यस्थ कोर्ट नियमों और शर्त से अलग जाकर मध्यस्थता नहीं कर सकता। यह कानून सम्मत नहीं है। हाई कोर्ट के इस फैसले से नगर बिलासपुर को आर्थिक नजरिये से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के फैसले से नगर निगम के खजाने से चार करोड़ 33 लाख रूपये की बड़ी राशि निकलने से बच गया है।

मध्यस्थ कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए नगर निगम बिलासपुर की ओर से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के डीविजन बेंच में अपील दायर की गई थी। मध्यस्थ कोर्ट ने सिंगापुर की कंपनी मैनहार्ट को चार करोड़ 33 लाख के भुगतान का आदेश दिया था। याचिका के अनुसार राज्य शासन ने

तीन करोड़ 33 लाख रुपये के डीपीआर को पास करते हुए केन्द्र सरकार के पास स्वीकृति के लिए भेजा था। केन्द्र ने बजट नहीं होने की बात कहते हुए शासन के प्रस्ताव पर अपनी असहमति जता दी थी।

इसी बीच सिंगापुर की मैनहार्ट कंपनी ने चार करोड़ 33 लाख रुपये की मांग कर दी । कंपनी ने इसे अपना शुल्क बताया। नगर निगम ने जब केंद्र द्वारा असहमति जताने की बात कहते हुए भुगतान करने से इनकार कर दिया तब मैनहार्ट कंपनी ने रायपुर के आर्बिट्रेटर और कमर्शियल कोर्ट में अपील पेश की। दोनों कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए नगर निगम बिलासपुर को भुगतान का निर्देश दिया। दोनों कोर्ट के फैसले को चुनोती देते हुए निगम में हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

याचिका के अनुसार योजना को केंद्र सरकार ने स्वीकृत ही नही किया है। बजट भी जारी नहीं किया है। इसके अलावा डीपीआर भी गलत बनाई गई है। मामले की सुनवाई जस्टिस गौतम भादुड़ी व जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल के डीविजन बेंच में हुई। प्रकरण की सुनवाई के बाद कोर्ट ने आर्बिट्रेटर कोर्ट व कमर्शियल कोर्ट के फैसले को रद कर दिया है। डीविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि मध्यस्थता कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय सुनाया है। जिन मुद्दों और विषयों के आधार पर याचिकाकर्ता और ठेका कम्पनी के बीच अनुबंध हुआ है उससे अलग हटकर मध्यस्थता नहीं किया जा सकता।

जिस तरह मैनहार्ट कंपनी द्वारा भुगतान को लेकर नगर निगम पर दबाव बनाया जा रहा है उसे देखते हूये निगम ने अपने वकील के जरिये सुप्रीम कोर्ट में केविएट दायर कर दिया है। दायर केविएट में निगम ने अनुरोध किया है कि ठेका कम्पनी द्वारा यावहिक दायर करने की स्थिति में फैसला सिलने से पहले उनका भी पक्ष सुना जाए। हालांकि निगम को हाई कोर्ट से राहत मिल गई है।

ये है मामला

  • वर्ष 2011 में बिलासपुर निगम सीमा में अंडर ग्राउंड सीवरेज सिस्टम तैयार करने के लिए निगम ने 33 करोड़ की योजना बनाई थी। कंसलटेंट कंपनी की नियुक्ति के लिए निविदा जारी की गई थी। कंपनी को डिजाइनिगं, प्लानिंग और कास्टिंग करनी थी। सिंगापुर की मैनहार्ट कंपनी को यह ठेका मिला और निगम ने कार्यादेश भी जारी कर दिया। अनुबंध के मुताबिक कंसलटेंट कंपनी को अपनी प्लानिंग राज्य और केन्द्र सरकार से अनुमोदित करानी थी। मैनहार्ट को कुल बजट की डेढ़ फीसद राशि कमीशन के रूप में दी जानी थी।
  • कुल बजट में से 80 फीसद राशि केन्द्र सरकार द्वारा, 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार और 10 प्रतिशत राशि निगम द्वारा वहन किया जाना था। योजना की लागत तकरीबन 33 करोड़ रुपये की थी। ठेका कंपनी ने तीन करोड़ 33 लाख रुपये का डीपीआर बनाकर राज्य शासन के समक्ष पेश कर दिया। कंपनी ने भुगतान के लिए निगम के समक्ष इसके लिए 11-11 लाख रुपये के चार बिल जमा किया था। इसमें से तीन बिलों के 33 लाख रुपये का भुगतान निगम ने ठेका कंपनी को कर दिया है।

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