छत्तीसगढ़

80 लाख की एलईडी फिटिंग के बाद भी कई वार्डों में अंधेरा! करोड़ों के बिजली बिल के बीच स्ट्रीट लाइट व्यवस्था पर सवाल, आखिर नगर निगम की निगरानी कहां?

 

रायपुर। दीपावली के त्योहार पर शहर की सड़कें और गलियां रोशन करने के उद्देश्य से नगर निगम ने जोन स्तर पर सभी 70 वार्डों के लिए अधोसंरचना मद से करीब 50 लाख रुपये और पार्षद निधि से लगभग 30 लाख रुपये, यानी कुल करीब 80 लाख रुपये की एलईडी फिटिंग खरीदी। लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद कई वार्डों में स्ट्रीट लाइट व्यवस्था अभी भी पूरी तरह दुरुस्त क्यों नहीं हो पाई?
खबर के अनुसार चक्रवात के बाद कई इलाकों में स्ट्रीट लाइट बंद रही और कुछ स्थानों पर कई दिनों तक अंधेरा छाया रहा। ब्राह्मणपारा वार्ड में भी शिकायत के बाद लंबे समय तक समस्या का समाधान नहीं होने की बात सामने आई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नगर निगम ने लाखों रुपये की एलईडी फिटिंग खरीदी है, तो फिर वार्डों में खराब स्ट्रीट लाइट को समय पर ठीक करने की व्यवस्था क्यों नहीं है?

सबसे बड़ा सवाल पार्षदों को करना पड़ेगा कॉल सीएम हेल्पलाइन से होगा क्या समस्या का समाधान

रायपुर नगर निगम में इन दोनों प्रतिनिधियों की सुनवाई अधिकारियों के समक्ष नहीं हो पाने के वजह से पार्षद अजय साहू के द्वारा दो बार सीएम हेल्पलाइन पर कॉल करने के बाद उनके क्षेत्र के आधे हिस्से में अब तक लग पाई है लाइट बाकी वार्डों के पार्षदों के यहां क्या 100% सेटेलाइट चल रही है या फिर वह सीएम हेल्पलाइन में कॉल करने से डर रहे हैं?

 

क्या एलईडी फिटिंग खरीदने से पहले प्रत्येक वार्ड की वास्तविक आवश्यकता का सर्वे किया गया था?
क्या निगम के पास खराब स्ट्रीट लाइट की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करने की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
और अगर बिजली विभाग को बार-बार शिकायतें करनी पड़ रही हैं, तो फिर जोन स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका क्या है?
खबर में यह भी सामने आया है कि कुछ स्थानों पर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी हुई। ऐसे में सवाल केवल स्ट्रीट लाइट के बंद होने का नहीं, बल्कि नगर निगम की निगरानी व्यवस्था और अधिकारियों की जवाबदेही का भी है।
एक तरफ नगर निगम पर बिजली बिल का बकाया बढ़कर करीब 360 करोड़ रुपये पहुंचने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर के कई हिस्सों में स्ट्रीट लाइट व्यवस्था को लेकर नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसे में नगर निगम से सवाल है—
80 लाख रुपये की एलईडी फिटिंग खरीदने के बाद भी अगर वार्डों में अंधेरा है, तो आखिर इस खर्च का लाभ जनता तक कितना पहुंचा?
क्या नगर निगम बताएगा कि 70 वार्डों में खरीदी गई एलईडी फिटिंग का वार्डवार इस्तेमाल कितना हुआ?
कितनी स्ट्रीट लाइट खराब हैं और कितनी शिकायतें अब भी लंबित हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—स्ट्रीट लाइट व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी की है?
जनता के पैसे से खरीदारी और उसके बाद भी अगर जनता को अंधेरे से जूझना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अमन प्रकाश न्यूज़ का सवाल—80 लाख की एलईडी फिटिंग के बाद भी वार्डों में अंधेरा क्यों? नगर निगम बताए, जिम्मेदारी किसकी है?

 

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