छत्तीसगढ़

5. दंतेवाड़ा में फागुन मड़ई की अनोखी परंपरा: नवमी पालकी, आंवला मारा रस्म और ताड़ के पत्तों से होलिका दहन

दंतेवाड़ा: मां दंतेश्वरी की नगरी में आयोजित यह मेला सिर्फ एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामूहिक उत्साह का एक अनोखा संगम है. मेले का नौवां दिन, विशेष रूप से आंवला मारा रस्म और ताड़ के पत्तों और औषधिय लकड़ियों से होलिका दहन के कारण काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है.

मां दंतेश्वरी की नवमी पालकी की भव्य परंपरा

12 दिनों तक चलने वाले फागुन मड़ई में सोमवार को चतुर्दशी पर मां की नवमी पालकी धूमधाम से निकाली गई. दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पुलिस जवानों ने पालकी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया. यह सम्मान पारंपरिक ढोल-नगाड़ों, बस्तरियाई नृत्य, वाद्य यंत्रों और लगभग 1100 देवी देवताओं की उपस्थिति में भव्य हो उठा. पालकी यात्रा नारायण मंदिर तक निकाली गई, जहां पूजा अर्चना के बाद पालकी को भैरवनाथ बाबा स्थल ले जाया गया. यहां भी पुलिस जवानों ने पालकी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया. इसके बाद पालकी वापस नारायण मंदिर पहुंची जहां माता दंतेश्वरी के साथ तीन बार परिक्रमा की गई. अंत में पालकी को पुनः दंतेश्वरी मंदिर लाकर पारंपरिक रीति रिवाजों के अनुसार स्थापित किया गया.

आंवला मारा रस्म: कष्टों को दूर करने वाली अनोखी परंपरा

मेले की सबसे चर्चित रस्म आंवला मारा निभाई जाती है. यह रस्म सदियों पुरानी है और इसके पीछे एक विशेष धार्मिक मान्यता जुड़ी है. इस रस्म में मंदिर समिति के सदस्य दो दलों में बंट जाते हैं और एक दूसरे पर आंवला फेंकते हैं. मान्यता है कि जिस व्यक्ति पर आवला पड़ता है, उसके दुःख-कष्ट दूर हो जाते हैं उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इस अनोखी परंपरा में आस्था के साथ एक मनोरंजक लोक रूप भी दिखाई देता है, जो मेले को और भी जीवंत बनाता है. मंदिर के पुजारी पंडित विजेंद्र नाथ जीया बताते हैं कि आंवला मारा रस्म फागुन मेले के नौवें दिन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है और इसे शुभता एवं शांति का प्रतीक माना जाता है.

ताड़ के पत्तों पर होलिका दहन

फागुन मेले की बड़ी विशेषता है ताड़ के पत्तों से होलिका दहन. दंतेवाड़ा में सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी जीवित है. पुजारी के अनुसार, यहां होलिका दहन दूसरे जगहों से एक दिन पहले किया जाता है. इस प्रक्रिया की शुरुआत भैरव बाबा मंदिर से ताड़ के पत्ते लाकर होती है. इन पत्तों को पहले दंतेश्वरी सरोवर में धोया जाता है. इसके बाद उन्हें मंदिर प्रांगण में बिछाकर उन्हीं पर होलिका की अग्नि प्रज्वलित की जाती है. होलिका बनाने में कई प्रकार की औषधीय लकड़ियों का उपयोग होता है.

  • चंदन की लकड़ी
  • आम की लकड़ी
  • अन्य औषधीय पौधों की लकड़ियां

इससे होलिका दहन के धुएं को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है.

होलिका की पूजा कर सात परिक्रमा

शाम होते ही मां दंतेश्वरी की पालकी को शनि मंदिर परिसर तक ले जाया जाता है. वहां ताड़ के पत्तों से बनी होलिका की पूजा कर सात परिक्रमा लगाई जाती हैं और फिर होलिका दहन होता है. विश्वास है कि इस होलिका की राख में चमत्कारी शक्ति होती है, इसलिए कई भक्त इसे अपने आंचल में भरकर घर ले जाते हैं.

होलिका दहन के बाद रंगभरी सुबह

दूसरे दिन सुबह होलिका दहन की ठंडी राख को पलाश के फूलों के प्राकृतिक रंग में मिलाया जाता है. यह रंग सबसे पहले माता दंतेश्वरी को अर्पित किया जाता है. इसके बाद लोग आपस में होली खेलना शुरू करते हैं.

बस्तर की यह पारंपरिक होली पूरी तरह प्राकृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध मानी जाती है. यहां होली खेलने का तरीका आज भी वर्षों पुरानी परंपराओं के अनुरूप ही है.

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