छत्तीसगढ़

2. भाजी, पलाश और चुकंदर से तैयार गुलाल, बिलासपुर में ‘इको-फ्रेंडली होली’ की नई मिसाल

बिलासपुर:  होली के रंग अब सिर्फ त्योहार की खुशियां ही नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी बन रहे हैं. बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के छात्र इको-फ्रेंडली हर्बल गुलाल और रंग तैयार कर न सिर्फ केमिकल मुक्त होली का संदेश दे रहे हैं, बल्कि इससे अच्छी आय अर्जित कर अपनी सेमेस्टर फीस भी भर रहे हैं. ‘स्वावलंबी छत्तीसगढ़ योजना’ के तहत चल रहे इस नवाचार से अब तक 160 से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो चुके हैं. छात्रों और प्रोफेसरों ने हर्बल कलर बनाने की पूरी प्रक्रिया और इसके फायदे साझा किए.
स्वावलंबन की ओर कदम, 160 छात्रों ने भरी सेमेस्टर फीस
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दिलीप कुमार ने बताया कि पढ़ाई के बाद जो समय बचता है, उसमें छात्र ‘स्वावलंबी छत्तीसगढ़ योजना’ के तहत हर्बल गुलाल और प्राकृतिक रंग बनाने का काम करते हैं. पिछले कई वर्षों से यह पहल जारी है और अब तक 160 विद्यार्थी अपनी कमाई से सेमेस्टर फीस भर चुके हैं. इस योजना का उद्देश्य छात्रों में स्वरोजगार की भावना विकसित करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है.
ऐसे बनता है हर्बल कलर, जानिए पूरा प्रोसेस
टेक्नोलॉजी विभाग के छात्र प्रदीप कोराम ने बताया कि बाजार में मिलने वाले ज्यादातर रंग केमिकल युक्त होते हैं, जो त्वचा और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं. ऐसे में घर की भाजी, सब्जियों और फूलों से आसानी से हर्बल गुलाल बनाया जा सकता है
सबसे पहले लाल भाजी, पालक भाजी, पलाश (टेसू) के फूल या चुकंदर जैसी प्राकृतिक सामग्री को साफ कर मिक्सी में पीसा जाता है. पीसने के बाद जो प्राकृतिक रंग निकलता है, उसे अरारोट या स्टार्च युक्त आटे में मिलाया जाता है. इस मिश्रण को अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर हाथों से मिक्स कर दोबारा ग्राइंडिंग की जाती है, ताकि गुलाल पूरी तरह चिकना और मुलायम बन सके. अंत में इसमें प्राकृतिक सुगंध जैसे गुलाब, लेमनग्रास और मोगरा की खुशबू मिलाई जाती है. इसके बाद अलग-अलग डिब्बों में पैक कर विभिन्न रंगों के हर्बल गुलाल तैयार किए जाते हैं.
हर्बल गुलाल के फायदे, त्वचा के लिए सुरक्षित विकल्प
छात्रा खुशी ने बताया कि केमिकल रंगों के इस्तेमाल से एलर्जी, खुजली, पिंपल, त्वचा का रूखापन और आंखों में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आती हैं. उन्होंने कहा कि हर्बल गुलाल इन साइड इफेक्ट्स से बचाने में मदद करता है. प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होते हैं और कई बार त्वचा को नुकसान पहुंचाने के बजाय लाभ भी देते हैं. जो लोग केमिकल रंगों के डर से होली नहीं खेलते, उनके लिए हर्बल गुलाल एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प है.
पर्यावरण संरक्षण के साथ आत्मनिर्भरता की मिसाल
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी लिख रहे हैं. हर्बल कलर का यह प्रयोग होली के त्योहार को सुरक्षित, स्वास्थ्यवर्धक और रोजगारपरक बना रहा है. इस होली अगर आप भी सुरक्षित रंगों के साथ त्योहार मनाना चाहते हैं, तो हर्बल गुलाल अपनाएं और केमिकल रंगों को अलविदा कहें.

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