छत्तीसगढ़

लिखना क्यों? सार्थक क्या?

एम. डी. आरिफ की रिपोर्ट…

गुजरे सप्ताह अंग्रेजी के वरिष्ठ संपादक टीएन नायनन ने 25 वर्षों से चले आ रहे अपने साप्ताहिक आर्थिक कॉलम को बंद करने की बात कहते हुए लिखा- उम्र के साथ सक्रिय पत्रकारिता से दूर होते जाने के कारण हर सप्ताह अब कुछ सार्थक कहना मुश्किल होता गया है। यह पढ़ मुझे खराब लगा। इसलिए कि मैं टीएन नायनन को पढ़ता रहा हूं। फिर अंग्रेजी पत्रकारों में भी तो नायनन, स्वामीनाथन अय्यर, शेखर गुप्ता, तवलीन, स्वप्नदास गुप्ता, प्रतापभानु मेहता, प्रभु चावला, बलबीर पुंज, जैसे मुश्किल से दर्जन भर पत्रकार होंगे जो दशकों से नियमित लिख रहे हैं और जिन्होंने विषय, विचार, राय के अपने-अपने अंदाज में लिखने के कर्म-धर्म में जीवन खपाया है। सोचें, 140 करोड़ लोगों की आबादी है भारत की। जबकि अंग्रेजी-हिंदी-भारतीय भाषाओं में बेबाक लिखने वाले कितने पत्रकार-संपादक बचे हैं? ऊंगलियों पर गिनने जितने भी नहीं?तभी क्या लगता नहीं कि लिखने वाली, विचार करने वाली मनुष्य प्रजाति भारत में विलुप्त होते हुए है? सबसे बड़ी बात जो नए लिक्खाड़ पैदा ही नहीं हो रहे हैं।

टीएन नायनन के कहे में पते का जुमला है– कुछ सार्थक कहना मुश्किल! हां, यह हकीकत है। मैं खुद कई बार सोचता हूं कि लिखना क्यों और किसके लिए? पर मैं क्योंकि स्वांतः सुखाय में जीता हूं तो मैं जीवन के उत्तरार्ध में भी वैसे ही लिखने का आदी हूं जैसे 1977, ‘जनसत्ता’ के वक्त से चला आ रहा है। पर टीएन नायनन का 25वर्षों में थकना समझ आता है। आखिर मैं भी 45 वर्षों की कलम घिसाई में अकसर सोचता हूं कि भारत की इक्कीसवां सदी की भदेश, क्रास भीड के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर ही है!

सचमुच भीड़ में कन्वर्ट हुए लोगों के लिए अब सब निस्सार है। भारत की आर्थिकी हो या राजनीति या समाज, धर्म, व्यवस्था में वह अर्थ, गहराई,जीवंतता और जिंदादिली है ही नहीं, जिस पर पहले कभी बेबाक लिखा जाता था और सबको महत्व और सार्थकता समझ आती थी। भारत अब कुल मिलाकर एक पटरी, ढर्रे, दिशा और नियति में चलता देश है। पढ़ना-लिखना, विचारना, भविष्य की चिंता या बूझना अर्थहीन है। न लोग अखबार, किताब (खासकर भारतीय भाषाओं में) पढ़ते हैं और न संपादकीय और संपादकीय लेख। भला भीड़ को पढ़ने की जरूरत ही क्या है! भीड़ की नियति भेड़चाल है। देखा-देखी व्यवहार है। बाजारों में, शॉपिंग मॉल में, सोशल मीडिया में टाइमपास है। कई बार लगता है पीवी नरसिंह राव के उदारवाद ने भारत के उच्च, मध्य और गरीब तीनों वर्गों में सिर्फ और सिर्फ बाजार, भूख और उपभोक्तावाद के संस्कार पैठाए हैं। उसी के चलते सदियों की गुलामी से चली आ रही पैसे और सत्ता की भूख को नए पंख लगे हैं।

मैं नवउदारवाद की वामंपथी थ्योरी को फिजूल मानता हूं। आखिर विकसित देशों में बाजार, उपभोक्तावाद, शॉपिग मॉल और धनधान्य की भूख के बावजूद ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, मीडिया, संस्कृति, साहित्य आदि का विकास भी इकोनॉमी व जीडीपी से कदमताल में हुआ है। ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जापान आदि की विकास यात्रा में संस्कृति, साहित्य, अखबार, मीडिया, ऑक्सफोर्ड-हार्वड, थियेटर, हॉलीवुड, ऑपेरा, आर्ट गैलेरी, पर्यटन समान रफ्तार में श्रेष्ठताओं की नित नई बुलंदिया छूते हुए हैं। लंदन, वाशिंगटन, पेरिस में वहां के पत्रकारों, लिक्खाड़ों, लेखकों में दर्जनों ऐसे स्तंभकार हैं, जो राष्ट्र-राज्य के थिंकटैंक, राजनीतिज्ञों, नीति-निर्धारकों और जागरूक नागरिकों के लिए सार्थकता के प्रतिमान हैं। तभी सजृनात्मकता, संस्कृति के तमाम आयाम समान रूप से नस्ल की मूलभूत तासीर में विकसित होते हुए हैं।

इसलिए सिडनी, पेरिस में नए वर्ष का हुजूम बना, भीड़ का रेला बना तो रंग-रोशनी, आतिशबाजी का जहां वैभव झलका वही ऑपेरा गायन व संस्कृति-सभ्यता के वे जश्न भी होते दिखे, जिससे समाज की कुलीनता, श्रेष्ठता और जीवन की पूर्णताएं झलकीं। इन विकसित देशों में कहीं भी समझ नहीं आया कि भीड़ भाग रही है ईश्वर के ठिकानों की और इस प्रार्थना के लिए कि मुझको भी लिफ्ट करा दे मौला। मुझे पर भी पैसा बरपा दे मौला!       (सौजन्य ए एन आई)

 

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