5. बस्तर के इस खास तरह के कोसे की ओडिशा में बढ़ रही डिमांड, हजारों लोगों को दे रहा रोजगार

जगदलपुर : एशिया महाद्वीप में सिर्फ बस्तर के साल वनों में प्राकृतिक रूप से जन्म लेने वाला रैली कोसा की डिमांड चांपा, कोरबा और ओड़िसा के अलावा अन्य राज्यों में हैं। रैली कोसा डेढ़ किमी लंबा धागा देता है। इस खासियत के चलते ही पूरी दुनिया में इसकी मांग है। बस्तर जिले में इसका संग्रहण आठ हजार एक सौ ग्रामीण करते हैं। बीते साल इन संग्राहकों ने दो करोड़ 43 लाख नग रैली कोसा एकत्र कर प्रति संग्राहक औसतन 15 हजार रुपए अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया था।
कोसा खरीदी के लिए मार्केट ओपन होने के कारण यहां का अधिकांश कोसा जांजगीर, चांपा, भागलपुर और कोटपाड़ के व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं। वहीं जिला मुख्यालय स्थित कोसा सेंटर में साड़ियां भी तैयार की जाती हैं। बस्तर का रैली कोसा हजारों को रोजगार दे रहा है। जानकारों का कहना है कि बस्तर के बेरोजगार कोसा वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण लेकर काम शुरू करें तो वे बेहतर स्थायी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, चूंकि कोसा वस्त्रों और इससे तैयार दिगर सामानों की मांग लगातार बढ़ रही है। संयुक्त संचालक सुदर्शन विश्वकर्मा ने बताया कि रैली कोसा सिर्फ बस्तर के साल वनों में ही पनपता है।
रेशम उद्योग विभाग प्रति वर्ष वन विभाग की मदद से जिले के साल वनों में 20 से अधिक कोसा प्रगुणन केन्द्र स्थापित कर पेड़ों पर 19 से 20 लाख मादा तितलियां छोड़ता है। यह तितलियां अर्जुनी व साल वृक्षों के खुरदरे तनों में अण्डे देती हैं। इसके चलते प्रतिवर्ष करीब तीन करोड़ रैली कोसा एकत्र किया जाता है। बस्तर का कोसा वस्त्र अपने विशेष रंग और गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में प्रख्यात है। इधर रैली कोसा से धागा निकालने के कार्य में धरमपुरा और कालीपुर की 40 से अधिक महिलाएं भी लगी हैं और प्रति माह लगभग छह हजार रूपये का आय प्राप्त कर रही हैं। जिले में प्रतिवर्ष एक हजार पचास किग्रा कोसा धागा तो निकाला जा रहा है।
तीन साल में कोसा के धागाकरण से आमदनी
वर्ष 2019- 20 6 लाख 11 हजार 715 रुपए
वर्ष 2020- 21 10 लाख 20 हजार 56 रुपए
वर्ष 2021- 22 10 लाख 15 हजार 557 रुपए
रेशम प्रभाग में प्रति वर्ष एक टन धागा उत्पादन
ग्रामोद्योग विभाग के रेशम प्रभाग द्वारा धरमपुरा में 22 साल से कोसा धागा प्रसंस्करण केन्द्र संचालित है। क्षेत्रीय तसर अनुसंधान केंद्र के प्रभारी एसके विश्वकर्मा बताते हैं कि एक साबूत रैली कोसा का वजन मात्र 2.5 ग्राम होता है। कॉस्टिक सोडा में उबालने के बाद इसका वजन 1.6 ग्राम रह जाता है। उबले हुए एक रैली कोसा से 1500 से लेकर 1800 मीटर अर्थात डेढ़ किलोमीटर से भी लंबा धागा निकलता है। इस विशेषता के कारण ही बस्तर के रैली कोसा की मांग अधिक है। धरमपुरा और कालीपुर की 60 महिलाएं प्रतिदिन रैली कोसा से मशीन से रिल्ड थ्रेड और मटकी के पेंदे में रगड़ कर घिचा धागा तैयार करती हैं। एक महिला प्रतिमाह 7 से 8 हजार रुपए अतिरिक्त आय प्राप्त कर लेती हैं। इन महिलाओं ने बीते वर्ष 600 किग्रा घिचा और 450 किलोग्राम रिल्ड थ्रेड तैयार किया था।
बाजार में 3 से 5 रुपए एक कोसा
अर्जुन और साल पेड़ में रैली कोसा का उत्पादन अधिक होता है। ग्रामीणों की आय का यह सबसे अच्छा जरिया है। हाट बाजारों और शहर में एक रैली कोसा 3 से 4 रुपए में बिकता है, जुलाई अगस्त में इसकी सबसे अधिक पैदावर होती है। कोसा चार प्रकार के होते हैं जिसमें टसर, मलबरी, इरी और मोगा शामिल हैं। बस्तर में टसर और मलबरी कोसा बहुतायत में पाया जाता है।
धागाकरण करने वाली प्रत्येक महिलाएं आठ से 10 हजार रुपए की आमदनी
रेशम विभाग द्वारा महिलाओं को धागाकरण के लिए नि:शुल्क प्रशिक्षण व मशीन उपलब्ध कराया जाता है। महिलाएं बाजार में ग्रामीणों से कोसा खरीदती हैं और फिर इससे धागा बनाती है। प्रत्येक महिला 8 से 10 हजार धागाकरण करती है, वर्तमान में कालीपुर, केशरपाल में ऐसी 60 महिलाएं काम कर रही हैं। कालीपुर में विगत वर्ष 20 महिलाओं ने धागाकरण करते 10 लाख रुपए का रेशम धागा बनाया। कालीपुर की रहने वाली अलका सरकार ने 11 लाख 342 हजार रुपए की आय प्राप्त की। वहीं दूसरे नंबर पर कांती पुजारी ने 89 हजार 775 रुपए का आय प्राप्त किया है।
रेशम विभाग संयुक्त संचालक सुदर्शन विश्वकर्मा ने कहा, अच्छी क्वालिटी का रैली कोसा सिर्फ बस्तर के साल वनों में ही पनपता है। कोसा खरीदी के लिए मार्केट ओपन होने के कारण यहां का अधिकांश कोसा जांजगीर, चांपा, भागलपुर और कोटपाड़ के व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं।



