राष्ट्रीय

कमल खिला, हाथ हिला और झाड़ू भी चली

गुजरात में न तो भाजपा नज़र, न भाजपा के नेता। जीते तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की है। मोदी के व्यवहार और वाकपटुता के प्रति गुजरात और देश की आशा का जादू दिख रहा है।… जो हो, जनता के अलग-अलग सिर माथे पर। जनता है तो उसके जनादेश तो होंगे ही। लोकतंत्र टिका रहेगा और सत्ता आती-जाती रहेगी।

एम.डी. आरिफ की रिपोर्ट………

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव चलते ही रहते हैं। चुनाव ही जनता को अपने-अपने स्थानीय जनसेवक चुनने का अधिकार और आजादी देते हैं। इससे जनता को अपने जनादेश की ताकत का आभास भी होता है। चुनावों से ही लोकतंत्र चलता, टिकता और समृद्ध होता रहता है। जनता इन चुनावों के नतीजों से चलने, होने वाली जननीति को भी समझने लगती है। जनसेवा के वादे के लिए चुनावों में उतरे जनसेवकों की छुपी मंशा भी समय-समय पर सामने आ ही जाती हैं। जनता ही है जो इन दलों के जनसेवकों को बार-बार मौका देती है।

राज्यों के ताजा चुनावों के बीच कुछ जगह उपचुनाव भी हुए हैं।गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो दिल्ली में नगर निगम चुनाव के नतीजे भी सामने हैं।तीन चुनावी राज्यों की ताजा राजनीतिक गणित इन राज्यों की जमीनी सच्चाई को दर्शाते हैं।तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे जनता की मनोस्थिति बताते हैं।

दिल्ली की स्थिति सभी राज्यों से खास और अलग है। दिल्ली की जनता के लिए इस बार के नगर निगम चुनाव बेहद खास रहे। पन्द्रह साल से दिल्ली में भाजपा ही नगर निगम चला रही थी। दिल्ली की जनता त्रिकोनी संकट में झुलती-जुझती रही थी। पन्द्रह साल से दिल्ली की नगर निगम में भी भाजपा ही चली आ रही थी। दिल्ली की जनता खुद को ‘न तीन में न तेरह में’ मान रही थी। पिछले कुछ सालों से दिल्ली की जनता का जनमत सीधा और साफ-सुथरा रहा है। लोकसभा चुनाव और केन्द्र में वे मोदी और भाजपा को चुनते रहे हैं। मगर विधानसभा और राज्य में उनको केजरीवाल और उनकी आप पसंद है। केन्द्र और नगर निगम में भाजपा, और बीच में आप के होने के कारण दिल्ली की जनता अपने विकास में भटकी रही है।  इसलिए जनता ने अब राज्य सत्ता को ही महानगर के नगर निगम को चलाने का काम सौंपा है।

उधर गुजरात में भाजपा की जीत प्रधानमंत्री मोदी की जीत माननी चाहिए। मोदी नाम का मुखमंत्र देश और उनके राज्य गुजरात पर छाया हुआ है। पांच दिन पहले मुझे सड़क रास्ते से अमदाबाद से राजकोट जाना हुआ। व्यापार कारोबारी गुजरात में ऐसा कुछ नया नहीं दिखा जो सारे देश में नहीं चल रहा हो। जमीन पर बढ़ता बोझ और गुजराती जीवन में बेरोज़गारी वैसी ही दिखी जैसी सारे देश में देखी जा सकती है। कहीं अंधाधुंध विकास की सड़न दिखी, तो कहीं विकास की साफ नज़रअंदाजी। लेकिन मोदी हैं तो सब मुमकिन है। गुजरात में न तो भाजपा जीती, न भाजपा के नेता। जीता तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की है। मोदी के व्यवहार और वाकपटुता के प्रति गुजरात और देश की आशा का जादू चलता दिख रहा है।

हिमाचल प्रदेश में पहाड़ी प्रतिष्ठा ने अपना पांच साला प्रबल संकल्प फिर दोहराया। हर पांच साल में राज्य सरकार बदल देने का रूख हिमाचल की जनता ने दर्शाया है। कठिन परिस्थितियों के प्रदेश में पांच साला सरकारों का जन-आधार विकास सीधा कारण रहता है। यह हिमाचल की जनता का अजूबा, एतिहासिक लोकतांत्रिक रवैया है। वहां की जनता किसी एक राजनीतिक दल पर पांच साल से ज्यादा भरोसा नहीं करती। ऐसे जनमत से जनता को सत्ता के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में भी मदद मिलती है। जनसेवकों को जमीन से जुड़े रहने के लिए जनता से जोड़ती है। उन्हें जमीन पर रखती है। इसको वहां के जनसेवकों को जनता की आशाओं पर सत्ता के काम करने का आदेश भी मानना चाहिए।

जो हो, जनता के अलग-अलग सिर माथे पर। जनता है तो उसके जनादेश के होंगे ही। लोकतंत्र टिका रहेगा और सत्ता आती-जाती रहेगी। सत्ता की सेवा नहीं, सेवा की सत्ता चलने दें। लोकतंत्र की जय जयकार है।

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