6. कच्चा शहद खाने से ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को किया जा सकता है कंट्रोल ! नई स्टडी ने किया हैरान

शहद के हेल्थ बेनिफिट्स के बारे में आपने खूब सुना होगा. सर्दियों में शहद का सेवन करने से सर्दी-जुकाम समेत कई इंफेक्शन से राहत मिलती है. साथ ही इम्यूनिटी मजबूत होती है. अधिकतर लोग मानते हैं कि डायबिटीज के मरीजों को शहद नहीं खाना चाहिए, क्योंकि यह बहुत मीठा होता है और इससे ब्लड शुगर बढ़ने का खतरा रहता है. हालांकि एक नई स्टडी में शहद को लेकर चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. इसमें बताया गया है कि कच्चा शहद (Raw Honey) डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल के मरीजों के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है. इस रिसर्च के बारे में विस्तार से जान लेते हैं.
कच्चा शहद शुगर और कोलेस्ट्रॉल घटाने में कारगर?
कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के शोधकर्ताओं की स्टडी में पता चला है कि शहद कार्डियोमेटाबॉलिक हेल्थ के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. कच्चा शहद (Raw Honey) फास्टिंग ग्लूकोस (खाली पेट के ब्लड शुगर लेवल) और हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद कर सकता है. इतना ही नहीं फैटी लिवर डिजीज से बचाने में भी शहद कारगर साबित हो सकता है. इस रिसर्च के शोधकर्ताओं का कहना है कि शहद को अगर चीनी या अन्य स्वीटनर्स की जगह डाइट में शामिल कर लिया जाए, तो इससे हेल्थ को कई फायदे होंगे. खासतौर से जिन लोगों की डाइट में 10% तक शुगर होती है, उनके लिए कच्चा शहद बेहद फायदेमंद हो सकता है.
हेल्दी फूड माना जा सकता है शहद
शोधकर्ताओं का कहना है कि कच्चा शहद और मोनोफ्लोरल शहद सबसे ज्यादा कार्डियोमेटाबॉलिक फायदे देता है. शहद में करीब 80% शुगर होती है, इसके बावजूद यह हेल्दी फूड माना जा सकता है. इस रिसर्च के को-ऑथर डॉ. तौसीफ अहमद खान के मुताबिक करीब 15% शहद कई दर्जन रेयर शुगर से बना होता है. यही कारण है कि शहद के कई साइक्लोजिकल और मेटाबॉलिक फायदे होते हैं. यह ग्लूकोस रिस्पांस को इंप्रूव करता है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस को घटाता है. यह हेल्दी गट के बैक्टीरिया की ग्रोथ को प्रमोट करता है.
डाइट में कितनी शुगर होनी चाहिए?
एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. एना मारिया कौशेल के मुताबिक लोगों को हेल्दी रहने के लिए अपनी डाइट में कम से कम शुगर एड करनी चाहिए. अगर आप लगातार 8 सप्ताह तक हर दिन औसतन 40 ग्राम शुगर का सेवन करेंगे, तो इससे हेल्थ पर कई पॉजिटिव इफेक्ट देखने को मिलेंगे. यह शुगर की उतनी मात्रा है, जितना हमारा शरीर लिवर को इंवॉल्व किए बिना प्रोसेस कर सकता है. ऐसा करने से कार्डियोवैस्कुलर डिजीज और मेटाबॉलिक रिस्क काफी कम हो जाएगा.



