‘जी-20’ पर नरेंद्र भाई की फ़तह के क़सीदे
इस एक दिसंबर से अगले तीस नवंबर तक के लिए हमारे नरेंद्र भाई मोदी ‘जी-20’ के अध्यक्ष बन गए तो आराधक इतने कुप्पा-कुप्पा हैं, गोया यह उनकी निजी उपलब्धि हो।

एम.डी. आरिफ की रिपोर्ट………
इंडोनेशिया के भारतवंशियों के सामने, नरेंद्र मोदी ने 2014 के पहले के भारत और 2014 के बाद के भारत में ‘बहुत बड़े फ़र्क़’ के बारे में भी ज्ञान-दान किया। कहा कि अब भारत छोटा सोचता ही नहीं है। स्टैच्यू बनाएगा तो दुनिया में सब से बड़ा। स्टेडियम बनाएगा तो दुनिया में सब से बड़ा। मीनमेखी कह सकते हैं कि नरेंद्र भाई को बताना चाहिए था कि दुनिया का कौन-सा सब से बड़ा कारखाना आठ साल में भारत में लगा, दुनिया का कौन-सा सब से बड़ा विश्वविद्यालय भारत में बना, दुनिया के कौन-से सब से बड़े रोज़गार-अवसर भारत में सृजित हुए? वग़ैरह-वग़ैरह। मगर ऐसी नकारात्मक सोच वालों के लिए किसे फ़ुरसत है?
इस एक दिसंबर से अगले तीस नवंबर तक के लिए हमारे नरेंद्र भाई मोदी ‘जी-20’ के अध्यक्ष बन गए तो आराधक इतने कुप्पा-कुप्पा हैं, गोया यह उनकी निजी उपलब्धि हो। उछल-उछल कर यह बताया जा रहा है कि अब दुनिया भर के उत्पाद के 80 प्रतिशत, विश्व व्यापार के 70 प्रतिशत, पुथ्वी के सकल भूभाग के 60 प्रतिशत और संसार की आबादी के दो तिहाई हिस्से के प्रमुख शिल्पी नरेंद्र भाई हो गए हैं। अगर ऐसा है तो बहुत अच्छा है। इस परिलब्धि पर रीझने का हक़ उपासकों को क्यों नहीं होना चाहिए?
मैं भी इस पर रीझा हुआ हूं कि जी-20 शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में अपने बहुत ही संक्षिप्त उद्बोधन में नरेंद्र भाई ने सर्व-स्पर्शी, सर्व-समावेशी, मम-भाव, सम-भाव, शांति और सौहार्द जैसे पावन शब्दों की सरिता बहाई; ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ का मंत्रोच्चार किया; भारत की अद्भुत विविधता, समावेशी परंपराओं और सांस्कृतिक समृद्धि का गुणगान किया; और, ‘लोकतंत्र की मातृश्री’ -भारत- के विभिन्न शहरों और राज्यों में होने वाली जी-20 की बैठकों में सब से सहभागी बनने का अनुरोध किया।
मौका मिलते ही फौरन ‘मत चूके चौहान’ मुद्रा अपना लेने की नरेंद्र भाई की अदा भी मुझे रिझाती है। इंडोनेशिया की राजधानी बाली में भारतीय समुदाय के सामने जब वे बोले तो बताने लगे कि अभी जिस समय मैं यहां आप से बात कर रहा हूं, डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर उड़ीसा में बाली जात्रा का महोत्सव चल रहा है। उन्होंने इंडोनेशिया में हीरे-जवाहरात का कारोबार करने वाले गुजरातियों का गर्वीला ज़िक्र किया और मूर्तिकार बप्पा न्यूमन नुआर्ता को 2018 में पद्मश्री से सम्मानित करने का ज़ोरदार उल्लेख किया। इंडोनेशिया में लगी भगवान विष्णु की विश्व की सब से ऊंची प्रतिमा नुआर्ता ने बनाई है। नरेंद्र भाई ने इंडोनेशिया के मशहूर नर्तक वायन डिबिया और समाजसेवी अगुस इंद्र उदयन को पद्मश्री से नवाज़ने को भी रेखांकित किया। डिबिया ने रामायण के अलग-अलग कांडों को लोकनृत्य में संजोया है और उदयन इंडोनेशिया में गांधी के विचारों को प्रचारित करने के लिए भारत की सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से चार आश्रम संचालित करते हैं।
नरेंद्र भाई ने गुजरात और इंडोनेशिया के ख़ास सांस्कृतिक संबंधों का बखान करने में भी कोई कसर नहीं रखी। उन्होंने याद किया कि कैसे जब वे पिछली बार जकार्ता आए थे तो राष्ट्रपति जोको विडोडो के साथ उन्होंने खूब पतंग उड़ाई थी। बोले कि मुझे तो गुजरात में संक्रांति पर पतंग उड़ाने का बहुत अभ्यास रहा है और यहां इंडोनेशिया में भी संक्रांति पर खूब पतंग उड़ाई जाती है। फिर बोले कि मैं तो द्वारकाधीश भगवान कृष्ण की धरती गुजरात में पला-बढ़ा हूं। मेरा तो जीवन वहीं बीता है। कहा कि बाली में ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसकी अभिलाषा नहीं होगी कि अपने जीवन में एक बार अयोध्या और द्वारका के दर्शन करे। लोग भले कहें, लेकिन मैं नहीं मानता कि यह सब उन्होंने गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनाव की वजह से कहा होगा। बाली की भूमि को नरेंद्र भाई ने महर्षि मार्कंडेय और महर्षि अगस्त्य के तप से पवित्र हुआ बताया। कहा कि भारत में गंगा है तो इंडोनेशिया में तीर्थगंगा है; भारत में हम हर कार्य गणेश जी को स्मरण कर के आरंभ करते हैं और इंडोनेशिया के घर-घर में भी गणेश जी विराजे हुए हैं; बाली का जन-जन महाभारत की गाथाओं के साथ बड़ा होता है।
अब बताइए, नरेंद्र भाई की इतनी अच्छी-अच्छी बातों की बलैयां लेने का मन किसे नहीं होगा? नरेंद्र भाई के साथ इस फुलवारी में टहलते हुए आप को अपने देश की भीतरी चिंताओं से मुक्ति का गुलाबी अहसास ख़ुद के भीतर नहीं भरना तो मत भरिए। उन्होंने तो इंडोनेशिया के भारतवंशियों के सामने, 47 बरस पहले आई फ़िल्म ‘ज़ख़्मी’ का गाना ‘आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं, प्यार भरे सपने सजाएं‘ गाने में कोई कसर बाकी रखी नहीं। ऐसा करते हुए उन्होंने 2014 के पहले के भारत और 2014 के बाद के भारत में ‘बहुत बड़े फ़र्क़’ के बारे में भी ज्ञान-दान किया। कहा कि अब भारत छोटा सोचता ही नहीं है। स्टैच्यू बनाएगा तो दुनिया में सब से बड़ा। स्टेडियम बनाएगा तो दुनिया में सब से बड़ा। मीनमेखी कह सकते हैं कि नरेंद्र भाई को बताना चाहिए था कि दुनिया का कौन-सा सब से बड़ा कारखाना आठ साल में भारत में लगा, दुनिया का कौन-सा सब से बड़ा विश्वविद्यालय भारत में बना, दुनिया के कौन-से सब से बड़े रोज़गार-अवसर भारत में सृजित हुए? वग़ैरह-वग़ैरह। मगर ऐसी नकारात्मक सोच वालों के लिए किसे फ़ुरसत है?
जिसे नहीं मानना, न माने, मगर जी-20 का अध्यक्ष बनने के बाद नरेंद्र भाई की कलगी में सुर्ख़ाब का एक पंख और लग गया है। आप कहते रहिए कि उस में उन का क्या है? जी-20 के अध्यक्ष तो क्रमवार बनते हैं, इस बार भारत की बारी थी तो भारत बना और नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं तो वे बने। कोई और होता तो वह बनता। यह सही है कि इस बार चार देशों के जिस समूह की अध्यक्षता की बारी आई थी, उस में भारत भी था। इस समूह के चार में से दो देश – रूस और टर्की – पहले अध्यक्ष बन चुके हैं। दक्षिण अफ्रीका और भारत बचे थे। इस बार भारत पर बाकी तीन की सहमति हुई। इस समूह की बारी जब कभी फिर आएगी तो ज़ाहिर है कि दक्षिण अफ्रीका को यह मौक़ा मिलेगा। सो, तब सिरिल रामफोसा वहां के राष्ट्रपति होंगे तो वे बन जाएंगे। नहीं तो जो होगा, वह बनेगा। अब इसी (कु)तर्क पर जिन्हें टिके रहना है, टिके रहें। नरेंद्र भाई तो अपने ऐरावत पर सवार हो गए हैं।
अपने जिन उत्पादों को आप अच्छा समझते हैं, अगर उनकी रंग-बिरंगी आकर्षक पैकेजिंग और धुआंधार मार्केटिंग आपको नहीं आती है और दूसरा कोई अपने गए-गुज़रे उत्पादों को भी देश-दुनिया के बाज़ार में ज़ोर-शोर से बेच आता है तो इस में किस का दोष है? अगर नरेंद्र भाई को हर बात के लिए नेहरू जी को कु़सूरवार ठहराने की लत पड़ी हुई है तो क्या यह ज़रूरी है कि आप भी अपनी हर नाकामी के लिए नरेंद्र भाई पर तोहमत लगाने की आदत डाल लें? अगर आप झक्कू देने के कदाचार में अपने को नहीं सानना चाहते हैं तो यह तो आप की समस्या है न? इस में नरेंद्र भाई क्या करें? क्या आप के चक्कर में वे अपना कर्म-सुख त्याग दें? क्या आप को नहीं मालूम कि जो पुनर्जन्म के पुजारी होते हैं, वे मोक्ष-प्राप्ति के साधन नहीं खोजा करते!
बात-बेबात चिल्ल-पों मचाना बंद कीजिए। सप्रयास आए या अप्रयास, छीना-झपटी से आए या पुण्य-फल से, बैठे-ठाले आए या हाथ-पैर मार कर, आयोजित तरीकों से आए या प्रायोजित तरीकों से, निरर्थक हो या सार्थक – अपनी झोली में आई हर चीज़ को उत्सव नहीं, महोत्सव बनाना सीखिए। इस कला की साधना के लिए नरेंद्र भाई लिखित सियासी संहिताओं का सहारा लीजिए। कलियुग में सतयुग की शास्त्रोक्त राह पर चलने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। इसलिए हर रोज़ बुक्का फाड़ कर रोने में क्या रखा है? इतने मासूम मत बने रहिए कि ‘एक आंसू भी हुकूमत के लिए खतरा है’ गुनगुनाते-गुनगुनाते ही ज़िंदगी बीत जाए। वरना एक वक़्त आएगा कि सदियों से जगी आप की थकी आंखों से बहते आंसू पोंछने कोई और तो आएगा नहीं और आप की हथेलियां भी ख़ुद निढाल पड़ी होंगी। तो आइए, भारत के नहीं, नरेंद्र भाई के, माथे पर बंधी ताजा पगड़ी का ज़श्न धूमधाम से मनाइए और उस की तरंग में सब-कुछ भूल जाइए।



