2024 का शिला-पूजन और वोटकतरे की कूदफांद
गुजरात और हिमाचल 2024 के लोकसभा चुनाव का शिला-पूजन हैं। दोनों प्रदेशों के अपने-अपने मसले हैं, अपने-अपने दुःख-सुख हैं और अपने-अपने सियासी आयाम हैं। लेकिन इस बार दोनों के रुख का एक अंतःसंबंध है। दोनों के बीच का यह झीना धागा आपको नंगी आंखों से भले ही दिखाई नहीं दे रहा हो, लेकिन उसे देखने के लिए किसी अंतरिक्ष-ख़ुर्दबीन की ज़रूरत भी नहीं है। यह धागा इतना संवेदी है कि उसके दोनों छोर पर बैठे लोग ‘नयनन ही सौं बात’ कर रहे हैं।

एम.डी. आरिफ की रिपोर्ट………
तिकड़मी संसार के टीवी परदे और अख़बारी पन्ने सूचनाओं और सर्वेक्षेणों का कैसा ही जालबट्टा हमारे आंगन में बिछा रहे हों, हिमाचल प्रदेश और गुजरात की आंचलिक बयार संकेत दे रही है कि दोनों ही प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सांसें फूली हुई हैं। हिमाचल में तो चुनाव प्रचार थमते-थमते विदा-गीत का संगीत भाजपा के लिए ऐसा कानफाड़ू हो गया है कि पचास-पचास कोस दूर से भी सुनाई देने लगा है। गुजरात में भी उसकी टांगों की कंपकंपी ने ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को पांच-सात दिनों के लिए अपने गृह-राज्य में ही तंबू गाड़ कर बैठने पर मजबूर कर दिया है।
हिमाचल में आज मतदान है। गुजरात में एक और पांच दिसंबर को वोट पड़ेंगे। दोनों राज्यों के मतदान में 18-23 दिनों का फ़र्क़ क्यों रखा गया है, यह तो आपको ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव कराने वाला वह ‘स्वायत्त’ निर्वाचन आयोग ही बता सकता है, जिसने ज़ोरशोर से अभी-अभी यह ऐलान किया है कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए वह अपने को पूरी तरह तैयार कर चुका है और अब यह सरकार पर है कि वह कब ‘एक देश-एक चुनाव’ का फ़ैसला लेती है। बहरहाल, आठ दिसंबर को दोनों प्रदेशों के चुनाव नतीजे जब आएंगे तो, मैं आश्वस्त हूं कि, कांग्रेस हिमाचल में सरकार बना रही होगी और भाजपा गुजरात में सरकार बनाने के लिए हाथ-पैर मार रही होगी।
भाजपा और उसके हमजोली-मीडिया की घोषणाएं हमें बता रही हैं कि हिमाचल में चुनाव नतीजे पांच बरस पुराना अपना इतिहास तक़रीबन दोहराएंगे और गुजरात के नतीजे नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह के चेहरों को पहले से भी बहुत ज़्यादा सुर्खरू बना देंगे। गोयबल्सी-उवाच की ये ऋचाएं बार-बार हमारे कानों में पेली जा रही हैं कि गुजरात में भाजपा इस बार 150 सीटों का आंकड़ा छूने वाली है और हिमाचल में भी उसकी सीटें 50 के आसपास पहुंचेंगी। लेकिन ज़मीनी हालचाल से मुझे लगता है कि गुजरात में भाजपा की मौजूदा गिनती में 25 से 28 की कमी होने वाली है और हिमाचल में वह अपनी आज की स्थिति से 18-20 पायदान नीचे खिसकेगी। इसका मतलब है कि गुजरात में उसके 83-86 विधायक ही चुन कर आ पाएंगे और हिमाचल में यह तादाद 25-27 रहेगी।
अगर हिमाचल में भाजपा अपनी सरकार खो देती है और गुजरात में उसके लिए खींच-खांच कर सरकार बनाने की नौबत आती है तो घुटन्ना-टोली के सियासी फिसलन की भावी रफ़्तार इतनी तेज़ हो जाएगी कि उसे देख कर, भाजपाइयों को तो आएगी ही, आपको भी घिन्नाटी आ जाएगी। इसलिए इस स्थिति को टालने के लिए नरेंद्र भाई और उनके आराधकों का सब-कुछ दांव पर लगा हुआ है। आख़िरकार नरेंद्र भाई और अमित भाई गुजराती अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र भाई पटेल को तो जानता ही कौन है? सो, गुजरात की तो जीत भी जुगल-जोड़ी की है और हार भी उसी की। भाजपा के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के गृह-प्रदेश हिमाचल में नरेंद्र भाई कई साल पार्टी-प्रभारी रहे हैं। सो, वहां की हार-जीत का ठीकरा-सेहरा भी इस जुगलबंदी के मत्थे है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सिर पर न तो भाजपा की जीत का सेहरा बांधा जा सकता है और न हार का ठीकरा फोड़ा जा सकता है। इस तरह गुजरात-हिमाचल प्रधानमंत्री मोदी की निजी प्रतिष्ठा का मसला हैं।
दोनों प्रदेशों के चुनावों को प्रभावित कर रहे स्थानीय मुद्दों और उनकी ऐन बगल में खड़ी राष्ट्रीय गुत्थियों के विस्तार में मैं इसलिए नहीं जा रहा कि पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा उन्हें जानता है। उनकी त्वरा में नरेंद्र भाई के मनभावन विषय तिरोहित-से हो गए हैं। राष्ट्रवाद समाया तो हमारी रगों में पहले से हुआ था, लेकिन अब वह इतना स्थिर हो गया है कि उसका कोई अतिरिक्त चुनावी लाभ भाजपा को हिमाचल में तो कतई नहीं मिलने वाला है और गुजरात में भी वह मोरबी के छींटों को धो-पोंछ कर साफ कर देने वाला रामबाण नहीं बन पाएगा। इस स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ बजी दुंदुभि को दम तोड़ते गुजरात के मतदाताओं ने अभी-अभी देखा है। सैन्य वर्दी पहन कर करगिल में दीवाली मनाते प्रधानमंत्री की तस्वीरें हिमाचल के पूर्व फ़ौजियों में कोई स्पंदन पैदा करने में अब समर्थ नहीं रही हैं और गुजरात का तो वैसे ही फ़ौज से बहुत दूर का रिश्ता है। इसलिए प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ मतदाताओं के मन की बात नहीं बन पा रही है।
गुजरात में अगर वोटकतरे अरविंद केजरीवाल कांग्रेस को नुक़्सान पहुंचाने के मकसद से नहीं घूम रहे होते तो भाजपा-सरकार के बांस पूरी तरह उल्टे लद गए होते। आम आदमी पार्टी गुजरात के मुकाबले को त्रिकोणीय तो नहीं बना पाई है, मगर उसकी छिटपुट सेंधमारी से कांग्रेस की मुश्क़िलें ज़रूर बढ़ गई हैं। भाजपा के प्रच्छन्न सहयोगी संगठन की भूमिका के अपने रणनीतिक कर्तव्यपथ पर चल रहे केजरीवाल के बारे में गुजरात के मतदाता की राय देखना दिलचस्प होगा। चुनाव नतीजों में आम आदमी पार्टी को मिले वोट से गुजराती मतदाता की चेतना और समझदारी का सबूत मिलेगा। हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं ने तो चुनाव प्रचार की शुरुआत होते ही केजरीवाल के मामले में अपना रुख साफ कर उनका बोरिया-बिस्तर बंधवा दिया था।
दोनों राज्यों के क़रीब 5 करोड़ 47 लाख मतदाताओं में हिमाचल के सिर्फ़ पौने छप्पन लाख हैं। लेकिन वे छप्पन इंच की छाती में धड़कनों को बेतरह तेज़ कर चुके हैं। वे अपने से दस गुनी मतदाता-शक्ति वाले गुजरात के लिए पथप्रदर्शक सरीखे बन गए हैं। यह अवधारणा ग़लत है कि गुजरात के 88 प्रतिशत हिंदू वहां के 10 फ़ीसदी मुसलमानों की उपस्थिति के भय से भाजपा को वोट देते हैं। अगर ऐसा भी मान लिया जाए कि सारे मुसलमान मतदाता भाजपा के ख़िलाफ़ कांग्रेस को वोट देेते हैं तो बाकी के 31 प्रतिशत वोट तो गुजरात में कांग्रेस को हिंदू मतदाता ही देते होंगे। 2017 के चुनाव में भाजपा को 49 प्रतिशत वोट मिले थे। इसका अर्थ तो यह है कि गुजरात के 39 प्रतिशत हिंदू भाजपा को वोट नहीं देते हैं। तो फिर नरेंद्र भाई काहे के अखिल भारतीय हिंदू हृदय सम्राट? इस कल्पित गाथा का अंत भी अब नज़दीक है।
इसलिए मैं मानता हूं, और मैं जानता हूं कि आप नहीं मानेंगे, कि गुजरात और हिमाचल 2024 के लोकसभा चुनाव का शिला-पूजन हैं। दोनों प्रदेशों के अपने-अपने मसले हैं, अपने-अपने दुःख-सुख हैं और अपने-अपने सियासी आयाम हैं। लेकिन इस बार दोनों के रुख का एक अंतःसंबंध है। दोनों के बीच का यह झीना धागा आपको नंगी आंखों से भले ही दिखाई नहीं दे रहा हो, लेकिन उसे देखने के लिए किसी अंतरिक्ष-ख़ुर्दबीन की ज़रूरत भी नहीं है। यह धागा इतना संवेदी है कि उसके दोनों छोर पर बैठे लोग ‘नयनन ही सौं बात’ कर रहे हैं। दिसंबर के दूसरे बृहस्पतिवार का सूरज जैसे-जैसे आसमान में चढ़ेगा, आंखों की इस भाषा की इबारत क्षितिज पर शक़्ल लेती जाएगी। फ़िलहाल हवाओं में ग़ुम इस खोए हुए चेहरे को देखने का इंतज़ार कीजिए। उसे अपनी आंखों में बसाए रखिए। यह तसव्वुर आपको तन्हा नहीं होने देगा। अभी के लिए इतना भी काफी है।



