राष्ट्रीय

मित्रों, भारत पृथ्वी का अकेला धर्म राष्ट्र!

जब भारतभूमि को वह धर्मराजा प्राप्त है जो कभी केदारनाथ, कभी काशी विश्वनाथ, कभी महाकाल, कभी अयोध्या, कभी दक्षिण, कभी उत्तर, कभी पूरब, कभी पश्चिम में पूजा के वस्त्र धारण किए हुए, ललाट पर चंदन और गले में रूद्राक्ष व माला पहने अपनी सत्ता की रक्षा के लिए शिखा धारण कर धर्मध्वजी होने का अभिनय करें।

एम.डी. आरिफ की रिपोर्ट………

इस हैडिग का आपको क्या अर्थ समझ आया? यदि नहीं तो आप दुनिया का नक्शा ले कर ढूंढे कि उसमें भारत के अलावा पृथ्वी पर वह दूसरा कौन सा देश है जहां का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या इस्लामी बादशाह देश का धर्म राजा बना हुआ है? शासक धर्म मान्यता की नित नई झांकी दर्शाएं होता है! जनता अपने प्रधानमंत्री को ईश्वर का अवतार और उसके धर्म-कर्म के अश्वमेघ यज्ञों, शाही भव्यताओं से गद्गद्‌ होती है। उससे धर्मराष्ट्र होने का गौरव, सुरक्षा और सतुयगी खुशहाली से अपने को विश्वगुरू समझती है। याद करें त्रेतायुग के धर्मनिष्ठ राजा दशरथ और राजा रावण के धर्मराष्ट्र को। या तो वह वक्त था या सन् 2021 का वक्त है जब भारतभूमि को वह धर्मराजा प्राप्त है जो कभी केदारनाथ, कभी काशी विश्वनाथ, कभी महाकाल, कभी अयोध्या, कभी दक्षिण, कभी उत्तर, कभी पूरब, कभी पश्चिम में पूजा के वस्त्र धारण किए हुए, ललाट पर चंदन और गले में रूद्राक्ष व माला पहने अपनी सत्ता की रक्षा के लिए शिखा धारण कर धर्मध्वजी होने का अभिनय करें। मैं यह लाईन शांतिपर्व से कोट कर रहा हूं।

तभी तुलना करें त्रेतायुग में उन राजा दशरथ और राजा रावण के महा अनुष्ठानों से मौजूदा राजा के धर्मध्वजी बतलाने के अनुष्ठानों और चमत्कारों से। क्या हिंदू प्रजा राजा नरेंद्र मोदी से मोटिवेटेड हुए अपने को धन्य नहीं मानते हुए है? क्या भारत सोने का बना हुआ नहीं है?

अब राजा और प्रजा की भारत मनोदशा से अमेरिका, योरोप के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों से तुलना करें? क्या कही भी कोई भी ऐसी धर्मध्वजी राजनीति करता मिलेगा? क्या अफीक्री देशों, उनके प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों में कोई अपने आदि कबीलाई धर्मों का ऐसा पालनकर्ता है? क्या सऊदी अरब के बादशाह को मक्का-मदिना में अलग-अलग हुए नवनिर्माणों के समय इस्लाम की ध्वजा लिए अपने को देवत्व खलीफा बतलाते हुए कोई हुआ है? क्या रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च की धर्मानुगत जारशाही के अनुष्ठानों में व्लादिमीर पुतिन को किसी ने पूजा-पाठ करते हुए अंधविश्वासों से जनता को रिझाया है? क्या चाईनीज-कम्युनिस्ट राष्ट्रपति, जापानी प्रधानमंत्री या यहूदियों के प्रधानमंत्री अपनी-अपनी हान, कंफ्यूशियस, बौद्ध या यहूदी सभ्यता के प्राचीन धर्मराष्ट्र को हिंदुओं के नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, योगी आदित्यनाथ, राहुल गांधी के धर्मध्वजा प्रतीका से धर्मराष्ट्र बनाते देखा है?

वक्त और प्रकृति से फर्क है राष्ट्र, राष्ट्रवादी बनाम धर्मंराज और धर्मध्वाजी राजा में! तभी इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक का भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है बल्कि वह दुनिया का वह धर्मराष्ट्र है जो कलियुगी चमत्कारों और अंधविश्वासों में सांस लेता है। इक्कीसवीं सदी में हिंदुओं को वह राजा मिला है जो कालू जादूओं, काले कपड़ों, की मान्यताओं, रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों तथा देवत्व की छाप के राजा,  राजा की सर्वज्ञता, उसकी एकलता, उसकी अलौकिक शक्तियों से प्रजा पर जादू करता है। सत्ता की रक्षा और विस्तार करता है।

सवाल है आधुनिक काल में यह चमत्कार कैसे? तो जवाब है भोले हिंदुओं की गुलाम-भक्त बुनावट और चाणक्य के लिखे सत्ता सूत्र। हां, सबका जवाब कौटिल्य लिखित (चाणक्य लिखित) अर्थशास्त्र के सूत्र है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के तेरहवें अधिकरण में अंधविश्वास और राजनीति के इतने फार्मूले सुझाए है कि उनमें एक-एक का उपयोग कर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सत्ता का धर्मध्वजा बना डाला है। अर्थशास्त्र के वी, 2 और V,3 के सूत्रों में प्रजा को अंधविश्वासों और झूठ में पाल कर कैसे राजनीति हो। इसके असंख्य सूत्र है। जैसे – राजा को अपनी अंदरूनी और बाहरी स्थितियों को मजबूत करने के लिए सामान्य लोगों की अंध मान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।… धार्मिक प्रथाएं अंधविश्वास मात्र है और शासकों को चाहिए कि वे अपने स्वार्थों के लिए इनसे लाभ उठाएं।…लोगों को राजा की सर्वज्ञता और देवता जैसे होने का अहसास कराया जाए।..गुप्तचरों के जरिए अफसरों, दुश्मन लोगों की गतिविधियों का पता लगा कर राजा लोगों के मन पर ऐसी छाप बनवाए कि हमारा राजा तो ऐसा है कि वह अपनी अलौकिक शक्तियों से सबकी सारी बातें जान लेता है।..राजा देवताओं का खास है यह भी प्रचारित हो।… अपनी अलौकिक शक्ति का परिचय देने के लिए वह जल में जादू के कुछ करतब भी दिखा सकता है।..आदि, आदि।

हां, कौटिल्य ने राजा के प्रचार के लिए और उसके देवत्व याकि भगवान होने की जनता को प्रतिति कराने के प्रचार में सात तरह के लोगों की सेवा लेने की सलाह दी है। ये छह तरह के लोग हैः ज्योतिषी, भविष्यवक्ता, कथावाचक, ईक्षणिक मतलब भविष्य का शुभाशुभ बताने वाले, गुप्तचर और साचिव्यकर याकि राजा का सहचर। अर्थशास्त्र के सूत्र 103 में पंडितों, पुरोहित वर्ग का महत्व बताते हुए लिखा है कि लोकमत बनाने के लिए पुरोहितों की महत्वपूर्ण भूमिका असरदार होती है। इससे राजा की अलौकिक शक्तियों याकि छप्पन इंची छाती का जलवा बनाने, विदेश में भी राजा के समक्ष देवताओं के प्रकट होने, राजा द्वारा स्वर्ग से वरदान लिए हुए होने और उसकी विजय अवश्यंभावी की धारणा बनती है। ऐसे ही अपने अफसरों से आकाश से लुआठी दिखा कर और नगाडे का शोर मचाकर दुश्मन और उसके लोगों की हार तय दिखलाई जाए।

अर्थशास्त्र के तेरहवेमं अध्याय में विजयेच्छु राजा की अलौकिक शक्तियों के प्रचार के लिए जो-जो सुझाए दिए गए है उन सबका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसे उपयोग कर रहे है यह घटनाओं के सिलसिले से मालूम होता जाएगा। चमत्कारों का सहारा लेना, सुसंगठित तंत्र द्वारा चतुराई से प्रचार करवा कर राजा की सर्वज्ञता और देवत्व की लोगों पर छाप बनाना, अंधविश्वासों को हवा देना, लोगों के बीच राजा की अलौकिक शक्तियों की भ्रांति बनाने का अनुभव इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी पर सिर्फ और सिर्फ हिंदू प्रापेत करते हुए है। इसलिए दुनिया का अकेला धर्मध्वजी शासन।  रामशरण शर्मा की पुस्तक प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार के अध्याय कौटिलीय अर्थशास्त्र में धर्म और राजनीति का यह उपसंहार है कि अंधविश्वास और राजनीति का आपसी रिश्ता कौटिल्य की कृति की ऐसी विशेषता है जिसकी और सामान्यत ध्यान नहीं दिया जाता। कौटिल्य ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि विदेश नीति में राज्य के हितसाधन के निमित्त जनसाधारण के अज्ञान और अंधविश्वास से राजा को लाभ उठाना चाहिए!

सोचे मौजूदा वक्त में इस उपसंहार पऱ। इसमें मेरी थीसिस यह है कि प्राचीन हिंदू राजाओं ने अपनी सर्वज्ञता में हिंदूओं को बुद्धीहीन, अंधविश्वासी बनाने का वह पाप किया जो कौम की ताकत जीरों हुई। सैकड़ों साल मुस्लिम बादशाहों की गुलामी झेली। उसी प्रवृति में नरेंद्र मोदी अपनी ध्वजाधारी राजनीति में हिंदुओं को बहलाते हुए, उनके अज्ञान का लाभ उठाते हुए वर्तमान और भविष्य को ऐसा खोखला बना दे रहे है कि इतिहास फिर रीपिट होगा।

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