छत्तीसगढ़

2. वॉलीबॉल का ऐसा जूनून की गाँव का बच्चा-बच्चा है चैंपियन, 25 से अधिक नेशनल प्लेयर

रायगढ़. जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर लोहरसिंह गांव वॉलीवाल के लिए मशहूर है। यहां 60 के दशक में शुरू हुआ यह खेल अब परवान चढ़ चुका है। इसी गांव में 25 से अधिक वॉलीवाल के नेशनल खिलाड़ी हैं। इस अकेले गांव में ही अब तक करीब तीन सौ मंझे हुए खिलाड़ी हैं। इस गांव के खिलाड़ी व सरकारी कर्मचारी कामता प्रसाद गुप्ता बताते हैं। खेल की शुरुआत करीब 60 के दशक में मानूराम गुप्ता, रामधन नायक, भुवनेश्वर गुप्ता, उसत गुप्ता, घनश्याम गुप्ता, गनपत गुप्ता, बालमुकुंद नायक व बालमुकुंद गुप्ता सहित अन्य के द्वारा की गई।

यह सभी अपने समय के वॉलीवाल चैपिंयन रह चुके हैं। उनका अनुशरण आज भी यहां के बच्चे कर रहे हैं। करीब 25 सौ से तीन हजार की आबादी वाले इस गांव के प्रत्येक घर में वॉलीवाल का खिलाड़ी मौजूद हैं। यहां खेल को बढ़ावा देने के लिए गांव में ही राज्य स्तरीय वॉलीवाल प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है। हालांकि पिछले दो वर्षों से कोरोना की वजह से स्पर्धा आयोजित नहीं की गई, लेकिन इससे पहले हुए स्पर्धा में राष्ट्रीय स्तर के वॉलीवाल स्पर्धा को लीड करने वाले दिनेश सिन्हा सहित अन्य खिलाड़ी भी यहां आकर स्पर्धा में हिस्सेदारी निभाए हैं। इसके अलावा नागपुर, ओडिशा, पुणे, हैदराबाद, विशाखापट्नम, पंजाब सहित अन्य प्रांतों खिलाड़ी यहां खेलने के लिए आए हैं।

खेल के दम पर 60 से अधिक कर रहे नौकरी
यहां के प्रतिभावान खिलाड़ी खेल के दम पर अपनी मुकाम भी बनाए हैं। गांव के वॉलीवाल खिलाड़ियों में करीब 50 से अधिक सरकारी नौकरी पर हैं। सबसे अधिक शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। इसके अलावा पुलिस सहित अन्य विभागों में अपनी सेवा दे रहे हैं। एक वॉलीवाल खिलाड़ी रायगढ़ जिले डीएसओ है। इसके अलावा गांव का ही खिलाड़ी जिला वॉलीवाल संघ का सचिव है।
क्षेत्र में प्रसिद्ध है खेल

इसकी प्रसिद्धी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खेल जब शुरू होता है कि गांव के हर गली में चार पहिया व दो पहिया वाहन रहता है। वाहनों की पार्किंग कई खेतों में किया जाता है। खिलाड़ियों के मनोरंजन के लिए चियर गर्ल बुलाए जाते हैं। रात को आर्केस्ट्रा होता है।

हर घर मैडल और शील्ड की भरमार
गांव के अधिकांश घरों में मैडल और शील्ड की भरमार है। इस गांव के निवासी व जिला पंचायत सदस्य खेमराज नायक बताते हैं कि वॉलीवाल स्पर्धा में विजयी होने के बाद पाए गए शील्ड और मैडल का इकट्ठा किया जाए तो एक ट्रैक्टर से कहीं अधिक होगा। गांव के कई परिवार शील्ड, ट्राफी और मैडल को अभी भी बड़ी हिफाजत के साथ रखे हैं।

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