छत्तीसगढ़

2017 में राहुल की यात्रा का सुझाव था! अगर होता तो आज की स्थिति किया होता?

लेकिन जरा सोचें कि 2017 आज से 5 साल पहले यह यात्रा निकल गई होती तो क्या होता? नंबर एक तो राहुल का 2019 में इस्तीफा नहीं होता। 2019 कॉ चुनाव में कांग्रेस सवा सौ से उपर सीटें जीतती और भाजपा 300 के पार नहीं जाती। नीचे रहती।

  • एम. डी. आरिफ की कलम से

रायपुर। एक बैठक में राहुल ने कहा था कि हमेशा दक्षिण से उत्तर या उत्तर से दक्षिण की ही बात क्यों की जाती है? पूर्व से पश्चिम की क्यों नहीं? एक यात्रा ऐसी भी निकलना चाहिए। बैठक में यात्रा के मुख्य संयोजक दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के मीडिया डिपार्टमेंट के इन्चार्ज जयराम रमेश दोनों थे। उन्होंने इसकी रुपरेखा बनाना शुरू कर दी है। उचित समय पर राहुल की यात्रा- दो की घोषणा हो जाएगी। एक शब्द है अनथक। विशेषण है। अतिशयोक्ति में लगाया जाता है। मगर राहुल वास्तव में हैं। अनथक यात्री।

आज देश भर से यात्राएं निकालने का ऐलान कर रहे हैं। अच्छी बात है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा की सफलता देखने के बाद यह जोश स्वाभाविक है। लेकिन जरा सोचें कि 2017 आज से 5 साल पहले यह यात्रा निकल गई होती तो क्या होता? नंबर एक तो राहुल का 2019 में इस्तीफा नहीं होता। 2019 कॉ चुनाव में कांग्रेस सवा सौ से उपर सीटें जीतती और भाजपा 300 के पार नहीं जाती। नीचे रहती।

2017 में राहुल नए अध्यक्ष बने थे। गुजरात पहला चुनाव था। इतनी दम से लड़े थे कि भाजपा हारते हारते बची थी। राहुल ने सौ का आंकड़ा नहीं छूने दिया था। 182 की विधानसभा में भाजपा 99 और कांग्रेस 80 थी। लगभग बराबरी का मुकाबला। ऐसे ही इसके बाद 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जीते और कर्नाटक में सहयोगी दल जेडी एस के साथ सरकार बनाई। वह राहुल की चढ़त के समय था। मध्याह काल। प्रखर ताप।

मगर कांग्रेस के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं को राहुल की यह उर्जा डरा गई।  उन्होंने कहना शुरू किया कि हमें कोई पूछता ही नहीं है। सोनिया गांधी के जरिए ऐसे लोग अपने काम करवाने लगे। कांग्रेस में कुछ समय से यह समस्या इतनी गंभीर है कि पद पर कोई होता है और सिफारिश किसी दूसरे की चल जाती है। अध्यक्ष रहते हुए राहुल को खुद इस तकलीफ का सामना करना पड़ा। और उससे पहले कई और नेताओं को भी।

यूपी में पिछले तीन दशक में कांग्रेस का झंडा एक ही बार बुलंद हुआ था जब दिग्विजय सिंह वहां के इन्चार्ज थे। 2009 के लोकसभा में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं। मगर इससे उनके लिए समस्याओं का अंत नहीं हो गया थे। उनके पास यूपी के पूर्नउद्धार का पूरा नक्शा था। और उसमें 21 सीटें जीतकर जो सर्वाधिक सीटें जीतने वाली सपा से केवल 2 कम थीं उन्होंने माहौल बना दिया था। मगर उन्हें भी ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ा जो बाद में राहुल को अध्यक्ष रहते हुए करना पड़ा था। दिग्विजय पार्टी को मजबूत करने के लिए वहां से किसी का नाम भेजते थे और यहां से कोई और नाम एनाउंस हो जाता था। आज भी कांग्रेस इस समस्या से निकल नहीं पा रही है कि कौन आदमी किस के जरिए राज्यसभा या पार्टी में पद पा जाता है। खैर अगर अब भी यह दौर जारी रहा तो यात्रा चाहे जितनी सफल हो जाए पार्टी में सत्ता के एक से ज्यादा केन्द्र चुनावों में उसका अपेक्षित लाभ मिलने नहीं देंगे। गुटबाजी तभी तेज होती है जब हाईकमान एक और मजबूत नहीं होता है।

जिस 2017 का जिक्र हम कर रहे हैं। वह उसी समय टर्निंग पाइंट बनने को तैयार था। मगर कांग्रेस के नेताओं ने ही उसे सेबोटाज कर दिया। उसी के विस्तार के रूप में 2020 में 23 लोगों ने गुट बनाकर राहुल के खिलाफ पत्र लिखा था। जिसके एक मुखिया अब पार्टी छोड़कर भाजपा के इशारों पर कश्मीर में काम करने लगे हैं। बाकी कुछ इधर, कुछ उधर हर दिशा में हैं। मगर छोड़िए उस दिशा को। आज हर दिशा से जब कांग्रेस की यात्रा निकलने की तैयारी हो रही है तो कांग्रेस को थोड़ा यह भी सोच लेना चाहिए कि 2017 में राहुल की यात्रा रोककर उन्होंने कितना बड़ा अपराध किया था।

आज जो इस भारत जोड़ो यात्रा के मुख्य संयोजक हैं उन्हीं दिग्विजय सिंह ने 2017 में अपनी करीब इतनी ही लंबी और इतने ही दिनों छह महीने की नर्मदा परिक्रमा शुरू करने से पहले राहुल गांधी को भारत परिक्रमा करने का सुझाव दिया था। राहुल को आइडिया पसंद भी आया था। मगर उन्हीं लोगों ने जो हर उस आइडिए को फेल करने में सिद्धहस्त रहे हैं जो राहुल की छवि निखारे और उन्हें कांग्रेस का केन्द्र बना दे प्रचार किया कि यात्रा से क्या होता है? यह समय यात्रा के लिए उचित नहीं है। जनता इस समय मोदी के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहती है। यह समय शांत रहने का है।

एक साथ इतनी सुरसरी छोड़ दीं कि राहुल कन्फ्यूज हो गए। नए अध्यक्ष बने थे। किसी को नाराज करना नहीं चाहते थे। खासतौर से सोनिया के साथ काम करे पुराने नेताओं को। तो यात्रा नहीं हुई। और फिर इस जीत से पुराने नेता इतने खुश हुए कि उन्होंने दिग्विजय की यात्रा में एक दिन या कुछ समय के लिए भी राहुल को नहीं जाने दिया। तमाम नेता उसमें शामिल हुए थे। यहां तक कि दिग्विजय के घोर विरोधी ज्योतिरादित्य सिंधिया तक मगर राहुल को वहां नहीं जाने दिया गया।

यात्राएं तो अपना काम करती हैं। दिग्विजय की यात्रा ने भी किया। मध्यप्रदेश में 15 साल से जमी भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंका । तब राहुल के मन में यात्रा की उपयोगिता आई। मगर उसके बाद समय नहीं था। लोकसभा चुनाव आ गए। राहुल ने पीठ में छुरा घोंपने वालों से परेशान होकर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कोविड आ गया। और इसी तरह 5 साल निकल गए। मगर अच्छा यह है कि नर्मदा यात्रा और उसके चमत्कारिक परिणामों को याद रखते अब राहुल ने यात्रा शुरू कर दी।

दरअसल कांग्रेस समझ ही नहीं पाई कि राहुल के रूप में उनके पास लोगों से जुड़ने का सबसे अच्छा जरिया है। राहुल जैसे लोग राजनीति में कम होते हैं। जो सत्ता से निस्पृह होते हैं। खुद उन्होंने कहा कि सत्ता उन्हें आकर्षित नहीं करती है। मगर लोग, जनता, बच्चे, बुजुर्ग, सड़क चलते गरीब मजदूर, मेहनतकश उन्हें अपनी और खींचते हैं।

राहुल सड़कों के आदमी हैं। आम आदमी से कनेक्ट करने वाले। अभी 15 दिन नहीं हुए मगर सड़कों के ऐसे और इतने ह्रदयस्पर्शी दृश्य आ गए हैं प्यार, स्नेह, अपनत्व, भरोसे के कि वे लोग जो तमाम राजनीतिक ताम झाम, कैमरों की भीड़, मीडिया मैनेजमेंट करते रहते हैं उनके पास ऐसे दिल जीतने वाले एक भी सीन नहीं होंगे। लोग आपको सुनने आ सकते हैं मगर मिलने के लिए नहीं। मिलने को तो वे दिल से राहुल गांधी से आ रहे हैं।

और जिस को ये वंशवाद कहते हैं उस वंश परम्परा के अनुरूप जैसे नेहरू, इन्दिरा, राजीव लोगों से मिलते थे राहुल आम लोगों से मिल रहे हैं। उनके यहां जाकर चाय पी रहे हैं। साथ बैठ रहे हैं। बच्ची की सेंडिल का तस्मा खुला है तो उसे बांध रहे हैं। बच्चों बुजुर्गों के हाथ पकड़कर चल रहे हैं। यह अद्भूत है। लोग कई यात्राओं का जिक्र करते हैं। हुई भी है इससे पहले। मगर यह इस मामले में सबसे निराली है कि इसका मुख्य यात्री लोगों से खूब दिल से मिलता जुलता चल रहा है।

राहुल बहुत तेज चलते हैं। सुबह साढ़े पांच, छह बजे से चलने को कहते हैं।\ 5 किलोमीटर ज्यादा 25 किलोमीटर रोज चलने को कहते हैं। मगर यात्रा में सब उम्र के लोग महिलाएं और उम्रदराज भी हैं। उनके लिए राहुल के पैमाने पर चलना संभव नहीं है। तो राहुल मान भी गए। अब कहना बंद कर दिया। पहले तीन चार दिन रोज कहते थे कि थोड़ा और सुबह निकल सकते हैं। अभी सात, पौने सात यात्रा शुरू होती है। और 20 ,21 किलोमीटर प्रतिदिन चलती है। कभी अगर राहुल की चल जाती है तो 22 भी।

कांग्रेस को 2024 तक राहुल को परमानेंट यात्री बना देना चाहिए। अभी यात्रा शुरू होने से पहले दिल्ली में यात्रा से संबंधित एक बैठक में राहुल ने कहा था कि हमेशा दक्षिण से उत्तर या उत्तर से दक्षिण की ही बात क्यों की जाती है? पूर्व से पश्चिम की क्यों नहीं? एक यात्रा ऐसी भी निकलना चाहिए। बैठक में यात्रा के मुख्य संयोजक दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के मीडिया डिपार्टमेंट के इन्चार्ज जयराम रमेश दोनों थे। उन्होंने इसकी रुपरेखा बनाना शुरू कर दी है। उचित समय पर राहुल की यात्रा- दो की घोषणा हो जाएगी।

एक शब्द है अनथक। विशेषण है। अतिशयोक्ति में लगाया जाता है। मगर राहुल वास्तव में हैं। अनथक यात्री।

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