इतिहास उज्जैन का आज सुनाऊंगी 5000 वर्षों की अपनी गौरव गाथा
मैं उज्जयिनी..मैं प्रतिकल्पा.मैं ज्योतिर्लिग महाकाल की नगरी अवंतिका। आज जब मेरी गोद में श्री महाकाल लोक के लोकार्पण प्रसंग पर सनातन का सत्व नई करवट ले रहा है, तब मुझे रह-रहकर अपने 5000 वर्षों की गौरुवगाथा याद आ रही है।

उज्जैन। मैं उज्जयिनी..मैं प्रतिकल्पा.मैं ज्योतिर्लिग महाकाल की नगरी अवंतिका। आज जब मेरी गोद में श्री महाकाल लोक के लोकार्पण प्रसंग पर सनातन का सत्व नई करवट ले रहा है, तब मुझे रह-रहकर अपने 5000 वर्षों की गौरुवगाथा याद आ रही है। कालों के काल महाकाल के सान्निध्य में मैंने जो कालखंड बिताया, आज उसके हर श्रेष्ठ व निकृष्ट क्षण की कहानी सुनाऊंगी।
मुझे मेरे सुपुत्र अर्थात महान भारतवर्ष में निवास करने वाले सनातनी धर्मालुजन प्रतिकल्पा नाम से भी पुकारते हैं, क्योंकि मैं प्रत्येक कल्प में उपस्थित रही हूं। मुझे और मेरी गोद में बह रही मेरी सुपुत्री शिप्रा को भी धर्मालुजन ‘त्रिभुवन वंदिता’ कहते हैं, अर्थात समूचा त्रिभुवन मेरी वंदना करता रहा है। शिप्रा तो मोक्षदायिनी भी कहलाती है और उसमें डुबकी लगाकर धर्मालुजन मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। यूं तो मेरा अस्तित्व तबसे है, जबसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ। किंतु बाद के कालखंड में समय ने मेरे ललाट पर ऐसी गौरवगाथा लिखी कि समूची दुनिया मुझे देख-देखकर चकित होती रही, आह्लादित होती रही।
उनके बाद भारत में सर्वाधिक प्रेम पाने वाले भगवान श्री कृष्ण का कालखंड भी मैंने देखा। जब कुरक्षेत्र में योगेश्वर असमंजस से भरे अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे थे, तब मैं महामौन साधे हुए उन्हें सुन रही थी। बाद में गीता के उसी ज्ञान को मेरी पुण्यधरा पर साधना करने वाले ऋषि-मुनियों ने अपने भाष्य, टीका में लिखा और मनुष्यता को जीवन का सच्चा मार्ग बताया। श्री कृष्ण ने तो मेरे वन में स्थित ऋषि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा भी ग्रहण की है।
पश्चिम में जब सभ्यता का सवेरा भी नहीं हुआ था, उस दौर में भी मेरी पुण्य धरा पर संस्कृति का सूर्य अपने प्रचंड उजास के साथ उपस्थित था और पूरी दुनिया को आलोकित कर अज्ञान के अंधकार का हरण कर रहा था। उसी कालखंड में मेरी गोद में ऐसे-ऐसे महान ऋषि-मुनि, ज्ञानी-विज्ञानी, आयुर्वेद के ज्ञाता, व्याकरण के आचार्य, महाकाव्यों के रचयिता और ग्रंथों के रचनाकार हुए कि उनके शोध व ज्ञान से आज तक मनुष्यता धन्य हो रही है।
फिर एक कालखंड वह भी आया, जब सम्राट विक्रमादित्य मेरी राजसत्ता के संचालक बने। मेरा यह सुपुत्र इतना विद्वान, परम प्रतापी, न्यायप्रिय और सत्यवादी था कि चक्रवर्ती सम्राट बना और समूचे विश्व में लोकप्रिय हुआ। समय की चाल को भांपते हुए विक्रमादित्य ने मेरी पुण्य धरा से ही कालगणना का नया अध्याय विक्रम संवत आरंभ किया। यह पश्चिम की कालगणना ईस्वी से भी 57 वर्ष पहले आरंभ हो चुका था। सनातन धर्मावलंबी आज भी इसी पंचांग के आधार पर काल की गणना करते हैं। इसी दौर में समूची दुनिया में ख्याति प्राप्त करने वाले महाकवि कालिदास ने मेरे ही आश्रम में महाकाव्य रचे। भास, बाणभट्ट, भर्तृहरि आदि ने मेरी ही भूमि से अपने ज्ञान का आलोक मनुष्यता को दिया।
मेरी गौरवगाथा में एक अध्याय ध्वंस-विध्वंस का भी आया, जब विदेश से आए विधर्मी ने मेरी धरती पर कदम रखे।वर्ष 1235 में आक्रांता शम्सुद्दीन इल्तुतमिस ने मालवा क्षेत्र पर आक्रमण किया और मुझ उज्जयिनी को पदाक्रांत किया। तत्कालीन हिंदू राजाओं और प्रजा ने इस आक्रांता का पुरजोर प्रतिकार किया, किंतु असुर-दल मालवा में प्रवेश कर गया। उस विधर्मी ने महाकाल मंदिर में भी विध्वंस मचाया और हजारों वर्षों से यहां पल्लवित-पुष्पित हो रही सनातन सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।
किंतु रात्रि का अंधकार सदैव नहीं रहा तो, सो नहीं रहा। वर्ष 1728 में सनातन का सूर्य पुन: प्रचंड हुआ और मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र पर विजय प्राा कर आक्रांताओं को खदेड़ दिया। उस कालखंड में मैं पुन: आनंद और वैभव को पाने लगी। वर्ष 1731 से 1809 तक मराठा सम्राटों ने मुझ अवंतिका को मालव जनपद की राजधानी बनाया। इसी दौरान देवाधिदेव महाकाल के मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसे भव्य स्वरूप दिया गया। ब्रिटिश शासन के अधीन हुए भारत की विवशता को भी मैंने देखा और उनसे लड़ते महान क्रांतिकारियों को भी। इस लंबी यात्रा की पथिक बनी मैं उज्जयिनी वर्तमान समय में प्रवेश कर गई हूं।



