नोटबंदी सोचा समझा फैसला था ,जिसने देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया!
हालांकि यह नहीं बताया जाएगा कि रिजर्व बैंक ने कैसे सरकार के साथ सहमति जताई थी क्योंकि वह लिखित विचार विमर्श का हिस्सा नहीं है।

एम.डी. आरिफ की रिपोर्ट………
यह कमाल की बात केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में कही है कि नवंबर 2016 में पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट बंद करने का जो फैसला हुआ था वह बहुत सोच समझ कर हुआ था और पूरे आठ महीने तक इस पर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ विचार विमर्श किया गया था। सोचें, आठ महीने तक विचार विमर्श और सोच समझ कर ऐसा फैसला फैसला किया गया था, जिसने देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया! सोचें, कैसे कोई सरकार या मुद्रा का विनियमन करने वाली संस्था सोच समझ कर ऐसा आत्मघाती फैसला कर सकती है? केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि उसने रिजर्व बैंक की लिखित सलाह के बाद फैसला किया था।
हालांकि यह नहीं बताया जाएगा कि रिजर्व बैंक ने कैसे सरकार के साथ सहमति जताई थी क्योंकि वह लिखित विचार विमर्श का हिस्सा नहीं है। असल में जब केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक के साथ सलाह मशविरा शुरू किया तब रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर थे और वे सरकार के इस फैसले से सहमत नहीं थे।
संभवतः इसलिए सरकार को फैसला करने में आठ महीने लग गए। रघुराम राजन ने सितंबर में जब इस्तीफा दिया तब उर्जित पटेल को नया गवर्नर बनाया गया और उसके बाद उनके दस्तखत वाले नए नोट की छपाई शुरू हुई, जिसके बाद आठ नवंबर को नोटबंदी का फैसला हुआ। सो, भले सरकार ने विचार विमर्श किया या रिजर्व बैंक नोटबंदी के फैसले पर राजी हुई लेकिन हकीकत यह है कि सरकार ऐसा चाहती थी तभी ऐसा हुआ। तभी यह रिजर्व बैंक का नहीं सरकार का फैसला था।



