4. सांप की तरह दिखने वाली यह मछली संजीवनी बूटी से कम नहीं, शरीर के लिए है बेहद फायदेमंद

बस्तर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहाँ की संस्कृति, खानपान, पहनावा, रहन-सहन इत्यादि बाकी जगहों से बिल्कुल अलग होता है। अपनी गौरव गाथा आदिम संस्कृति के लिए बस्तर पूरे विश्व में विख्यात है। इसी मान्यता की वजह से बस्तर में बहुत से जलीय जीवों को प्रमुखता से एवं बड़े शौक से खाया जाता है। इस जलीय जीवों में मछली, केकड़ा, झींगा आदि शामिल हैं। बस्तर के नदियों में मिलने वाले जलीय जीवों को खाने से शरीर स्वस्थ एवं रोगमुक्त रहता है।
बस्तर के नदियों, तालाबों में मछली की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से एक मछली ऐसी भी है जो, देखने में बिल्कुल सांप के जैसी डरावनी लगती है लेकिन रोगों के दवा के तौर पर इस मछली को बड़े चाव से खाया जाता है। इस मछली को डुडूम मछली के नाम से जाना जाता है। इस मछली को बस्तर के हाट बाजारों में भी बेचा जाता है।
यह डुडूम मछली आकार में बिल्कुल सांप जैसी ही दिखाई देता है। इसे अगर पहली बार देखा जाए तो यह सांप जैसा लगता है। बस्तर के स्थानीय लोग इस मछली को डुडूम मछली या कोचिया मछली के नाम से जानते हैं। स्थानीय लोग हल्बी बोली में इसे कोचेला मछली, बस्तर की गोंडी बोली में डुडूम मछली बस्तर के अबुझमाड़ माडि़या, मुरिया आदिवासी इसे बामी, बामे मछली के नाम से जानते हैं।
इस मछली की सबसे खास बात यह है कि इसमें अधिक ऊर्जा होता है। शाकाहारी भोजन खाने वाले लोग भले ही इसे खराब मानते है लेकिन डुडूम मछली के शौकीनों के लिए इसे उ़डीसा से लाकर बेचा जाता है। यह डुडूम मछली संजीवनी बूटी से कम नहीं माना जाता है।
बस्तर क्षेत्र में इस मछली को बहुत से नामों से जाना जाता है:
कोचेला
कोचिया
बामी
बामे
अगर आप कभी बस्तर जाते हैं तो यह आपको वहां के हाट बाजारों में आसानी से नजर आएंगी। आदिवासी इस मछली को बहुत ख़ास मानते हैं क्योंकि इसको खाने से शरीर को अतिरिक्त ताकत मिलती है। गर्मी के मौसम में तालाबों या नदियों में पानी का स्तर कम होने के बाद डुडूम मछली पकड़ना आसान हो जाता है।
डूढूम मछली देखने में सर्प जैसी
डुडूम मछली सांप से सिर्फ थोड़ा सा ही अलग दिखता है। इसके सिर के नीचे दो गलफ़डे होते हैं। जब यह रेंग कर सांप की तरह जमीन पर चलती है तो लोगों को बिलकुल धोखा ही हो जाता है कि यह मछली है या सांप। इस मछली को बहुत ही पौष्टिक माना जाता है।
इन मछलियों का अत्यधिक शिकार किया जाने लगा है इस वजह से यह डुढूम मछली अब बस्तर में दुर्लभ हो गई हैं। बस्तर के लोगों का यह मानना है कि इस मछली को खाने से शरीर में खून बढ़ता है। इसके साथ ही यह मछली लकवा से ग्रसित व्यक्तियों के लिए काफी लाभदायक औषधि के रूप में काम करती है। यह मछली ईल मछली की एक प्रजाति है।
इस मछली के औषधीय गुणों की वजह से गाँव के ग्रामीण इसे बड़े चाव से इसे खाते है। इसे खाने वाले लोग ऐसा मानते हैं कि इस मछली को खाने से ह्दय रोग, टी0बी0 एंव अस्थमा जैसे रोगों का असर कम होता है। इसके खून का प्रयोग कुछ लोग हाथ पैर में मालिश करने के लिए भी करते है।



